ये साल भी यारों बीत गया.. कुछ ख़ून बहा, कुछ घर उजड़े..

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गुरुवार, 3 जनवरी 2019

दीवार पर लिखी साफ इबारत को पढने में मोदी-शाह को हिचक क्यों ?



2019 के चुनाव को लेकर सत्ता के सामने सवाल दो ही है । पहला , ग्रामीण भारत की मुश्किलो को साधा कैसे जाये । दूसरा, अयोध्या में राममंदिर पर निर्णय लिया क्या जाये । और संयोग से जो रास्ता मोदी ने पकडा है वह उस वक्त भी साफ मैसेज दे नहीं रहा है जब आम चुनाव के नोटिफेकिशन में सौ दिन से भी कम का वक्त बचा है । ग्रामिण भारत को राहत देने के लिये तीन लाख करोड की व्यवस्था रिजर्व बैक से की तो जा रही है लेकिन राहत पहुंचेगी कैसे । और राहत देने के जो माप-दंड मोदी सत्ता ने ही जमीन की माप से लेकर फसल तक को लेकर की है उसके डाटा तक सरकार के पास है नहीं तो तीन लाख करोड का वितरण होगा कैसे कोई नहीं जानता । यानी अंतरिम बजट में अगर मोदी सत्ता एलान भी कर देती है कि खाते में रुपया पहुंच जायेगा तो भी सिस्टम इस बात की इजाजत नहीं देता कि वाकई एलान लागू हो जायेगा । यानी चाह अनचाहे बजट में सुविधाओ की पोटली एक और जुमले में समा जायेगीा । तो दूसरी तरफ राम मंदिर निर्माण पर जब मोदी ने अपने इंटरव्यू में साफ कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही कोई निर्णय होगा तो उसके मर्म में दो ही संकेत दिखायी दिये । पहला , विहिप, बंजरंग दल या कट्टर हिन्दुवादी ताकतो को राज्य सत्ता की खुली छूट है लेकिन राम मंदिर निर्माण में कानून का राज चलेगा । दूसरा , भीडतंत्र या कट्टरता को राज्यसत्ता तभी तक सहुलियत देगी जब तक कानून का राज खत्म होने की बात खुले तौर पर उभरने ना लगे । यानी लकीर धुंधली है कि जो मोदी सत्ता को अपनी सत्ता मानकर कुछ भी करने पर आमादा है वह संभल जाये या फिर चुनाव तक संभल कर भीडतंत्र वाला रवैया अखतियार करें । तो क्या अंधेरा इतना घना हो चला है कि मोदी अब इस पार या उस पार पर भी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है ।

जाहिर है यही से मोदी सत्ता  को लेकर बीजेपी के भीतर भी अब नये सवाल खडे हो चले है जिसके संकेत नीतिन गडकरी दे रहे है । हालाकि गडकरी के पीछे सरसंघचालक मोहन भागवत की शह है इसे हर कोई नागपुर कनेक्शन से जोड कर समझ तो रहा है लेकिन गडकरी के पास भी जीत का कोई तुरुप का पत्ता है नहीं  , सभी समझ इसे भी रहे है । इसलिये तत्काल में बीजेपी के भीतर से कोई बडा बवंडर उठेगा ऐसा भी नहीं है लेकिन चुनाव तक ये बंवडर उठेगा ही नहीं ऐसा भी नहीं है । और बीजेपी टूट की तरफ बढ जायेगी । संघ किसी बडे बदलाव के लिये कदम उटायेगा । या मोदी -शाह की जोडी सिमट जायेगी । ये ऐसे सवाल है जिसका उतर बीजेपी संभाले अमित शाह और सरकार चलाते नरेन्द्र मोदी के उठाये कदमो से ही मिल सकता है । और दोनो के ही कदम बीजेपी और संघ परिवार को बीते चार बरस से ये भरोसा जताकर उठाये जाते रहे कि उनके ना खत्म होने वाले अच्छे दिन अब आ गये । या अच्छे दिन तभी तक बरकरार रहेगें जब तक मोदी-शाह की जोडी काम कर रही है । ध्यान दें तो इस दौर में ना तो बीजेपी के भीतर से कभी कोई ऐसी पहल हुई जिसमें अमित शाह निशाने पर आ गये हो या मोदी के गवर्नेंस को लेकर कोई सवाल संघ या सरकार के भीतर से उठा । और यूपी चुनाव में जीत तक वाकई सबकुछ अच्छे दिन वाला ही रहा । पर यूपी में सीएम और डिप्टी सीएम की लोकसभा सीट पर हुये उपचुनाव की हार के बाद कर्नाटक में हार और गुजरात में 99 सीटो की जीत ने कुछ सवाल  जरुर उठा दिये लेकिन बीजेपी - संघ परिवार के भीतर अच्चे दिन है.... जो बरकरार रहेगें की गूंज बरकरार रही  । लेकिन जिस तरह तीन राज्यो में हार को एंटी इनकंबेसी और तेलगना-मणीपुर को क्षेत्रिय दलो की जीत बताकर मोदी-शाह की जोडी ने आगे भी अच्छे दिनो के ख्वाब को संजोया या कहे बीजेपी-संघ परिवार को दिखाना चाहा उसमें पहली बार घबराहट सरकार-पार्टी-संघ परिवार तीनो जगह दिखायी देने लगी । गडकरी ने अगर हार की जिम्मेदारी ना लेने के सवाल उठाये तो मोहन भागवत ने 2019 में प्रधानमंत्री कौन होगा पर ही सवालिया निशान लगा दिया । बीजेपी सांसदो के सुर अपने अपने क्षेत्रानुकुल हो गये  । किसी को लगा राम मंदिर पर विधेयक लाना जरुरी है तो किसी को लगा दलित मुद्दे पर बहुत झुकना ठीक नहीं तो किसी ने माना गठबंधन के लिये  सहयोगी दलो के सामने नतमस्तक होना ठीक नहीं । और असर इसी का रहा कि एक तरफ अपनी कमजोरी छुपाने के लिये बीजेपी ने गठबंधन को महत्व देना शुरु कर दिया तो दूसरी तरफ मोदी सत्ता ने अतित के हालातो को वर्तमान से जोडने की कोशिश की । मसलन बिहार में पासवान की पार्टी एक भी सीट जीत पायेगी नहीं पर छह सीटे पासवान को दे दी गई । जिससे मैसेज यही जाये कि साथी साथ नहीं छोड रहे है बल्येकि सिर्फ सीटो के समझौते का संकट है । यानी बीजेपी के साथ सभी जुडे रहना चाहते है ये परसेप्शन बरकरार रखने की कोशिशे शुरु हो गई । लेकिन इसी के सामानातंर विपक्ष के महागठंबधन को जनता के खिलाफ बताकर खुद को जनता बताने की भी कोशिश मोदी-शाह ने शुरु की । लेकिन इस पहल से कही ज्यादा घातक अतित के हालातो को नये हालातो पर हावी करने की सोच रही । जैसे तेजस्वी यादव के बाल्यकाल के वक्त हुये लालू के घोटालो में तेजस्वी यादव को ही आरोपी बनाया गया । इसी तरह राहुल गांधी भी बोफोर्स और इमरजेन्सी के कटघरे में खडे किये गये । ध्यान दें तो जो छल गरीब किसान मजदूर का मुखौटा लगाकर कारपोरेट के हित साधने वाली नीतियो तले आम जनता से हुआ । कुछ इसी अंदाज में विपक्ष की सियासत को साधने के लिये अतीत के सवाल उठाये जा रहे है । यानी चाहे अनचाहे मोदी-शाह की थ्योरी तले एक थ्योरी जनता में भी बन रही है कि आज नहीं तो कल उनका नंबर आ जायेगा । जहा सत्ता उनसे छल करेगी । यानी खुद की कमजोरी छुपाने के लिये उटाये जाते कदम ही विपक्ष की कतार को कैसे बडा कर रहे है ये तीन राज्यो के जनादेश में झलका । और यही हालात 2019 के जनादेश में छिपा हुआ है । क्योकि पन्ना प्रमुख से लेकर बूथ पर कार्यक्ताओ की फौज को लगने की कमर्ठता वामपंथी रणनीति की तर्ज पर बीजेपी ने अपनाया । फिर 10 करोड से ज्यादा सदस्य बोजेपी से जुडने और तमाम तकनीकी जानकारी के साथ सत्ता भी हाथ में होने के बावजूद अगर बीजेपी तीन राज्हायो में हार गई तो मतलब साफ है कि मोदी सत्ता ने समाज के किसी समुदाय को अपना नहीं बनाया । हर समुदाय को अच्छे दिन के सपने दिखाये गये । लेकिन हर किसी ने खुद को छला हुआ पाया । तो पार्टी चलाने का वृहत इन्फ्रसट्रक्चर हो या सत्ता के पास अकूत ताकत । जब जनता ही साथ जोडी नहीं गई तो फिर ये सब कैसे और कबतक टिकेगा । यानी सवाल ये नहीं है कि जातिय समीकऱण में कौन किसके साथ साथ होगा । या राजनीतिक बिसात पर महागठबंधन की काट के लिये बीजेपी के पास सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला है । दरअसल साढे चार बरस में नीतियो के एलान तले अगर जनता का पेट खाली है । हथेली में रोजगार नहीं है तो फिर मुद्दा जातिय या धर्म या पार्टी के सांगठनिक स्ट्रक्चर को नहीं देखेगी । ये  एहसास अब बीजेपी और  संघ परिवार में भी हो चला है । तो आखरी सच यह भी है कि मोदी-शाह की जोडी सत्ता-पार्टी पर नकेल ढिला करेगी नहीं । और बाहर से उठी कोई भी आवाज बीजेपी की टूट की तरफ बढेगी ही । और 2018 में चुनावी हार के बाद जो इबारत मोदी-शाह पढ नहीं पाये 2019 में तो दीवार पर किसी साफ इबारत की तरह वह लिखी दिखायी देनी लगी है । अब कोई ना पढे तो कोई क्या करें ।

2014 में लूट या 2018 में टूट ... 2019 के सामने चुनौतियां


नये बरस का आगाज सवालो के साथ हो रहा है । ऐसे सवाल जो अतीत को खंगाल रहे है और भविष्य का ताना-बाना अतित के साये में ही बुन रहे है । देश लूट या टूट के मझधार में आकर फंसा हुआ है । देश संसदीय राजनीतिक बिसात में मंडल-कमंडल की थ्योरी को पलटने के लिये तैयार बैठा है । देश के सामने आर्थिक चुनौतिया 1991 के आर्थिक सुधार को चुनौती देते हुये नई लकीर खिंचने को तैयार है । देश प्रधानमंत्री पद की गरिमा और ताकत को लेकर नई परिभाषा गढने को तैयार है । और बदलाव के दौर से गुजरते हिन्दुस्तान की रगो में पहली बार भविष्य को गढने के लिये अतित को ही स्वर्णिम मानना दौड रहा है । ध्यान दे तो बरस बीतते बीतते एक्सीडेंटल प्राइम मनिस्टर मनमोहन सिंह की राजनीति और अर्थशास्त्र को उस सियासत के केन्द्र खडा कर गया  जो सियासत आज सर्वोच्च ताकत रखती है ।
सिलसिलेवार तरीके से  2019 में उलझते हालातो को समझे तो देश के सामने पहली सबसे बडी चुनौती भ्रष्टाचार की लूट और सामाजिक तौर पर देश की टूट के बीच से किसी को एक को चुनने की है । काग्रेसी सत्ता 2014 में इसलिये खत्म हुई क्योकि घोटालो की फेरहसित देश के सामने इस संकट को उभार रही थी कि उसका भविष्य अंधकार में है । पर 2018 के बीतते बीतते देश के सामने भ्रष्ट्रचार की लूट से कही बडी लकीर सामाजिक तौर पर देश की टूट ही चुनौती बन खडी हो गई । संविधान से नागरिक होने के अधिकार वोटर की ताकत तले इस तरह दब गये कि देश के 17 करोड मुस्लिम नागरिक की जरुरत सत्ता को है ही नहीं इसका खुला एहसास लोकतंत्र के गीत गाकर सत्ता भी कराने से नहीं चुकी  । नागरिक के समान अधिकार भी वोटर की ताकत तले कैसे दब जाते है इसे 14 करोड दलित आबादी के खुल कर महसूस किया । यानी संविधान के आधार पर खडे लोकतांत्रिक देश में नागरिक शब्द गायब हो गया और वोटर शब्द हावी हो गया । 2019 में इसे कौन पाटेगा ये कोई नहीं जानता ।   
2019 की दूसरी चुनौती 27 बरस पहले अपनाये गये आर्थिक सुधार के विकल्प के तौर पर राजनीतिक सत्ता पाने के लिये अर्थवयवस्था के पूरे ढांचे को ही बदलने की है । और ये चुनौती उस लोकतंत्रिक सत्ता से उभरी है जिसमें नागरिक , संविधान, और लोकतंत्र भी सत्ता बगैर महत्वहीन है । यानी किसान का संकट , मजदूर की बेबसी , महिलाओ के अधिकार , बेरोजगारी और सामाजिक टूटन सरीखे हर मुद्दे सत्ता पाने या ना गंवाने की बिसात पर इतने छोटे हो चुके है कि भविष्य का रास्ता सिर्फ सत्ता पाने से इसलिये जा जुडा है क्योकि 2018 का पाठ अलोकतांत्रिक होकर खुद को लोकतांत्रिक बताने से जा जुडा । यानी देश बचेगा तो ही मुद्दे संभलेगें । और देश बचाने की चाबी सिर्फ राजनीतिक सत्ता  के पास होती है । यानी सत्ता के सामने संविधान की बिसात पर लोकतंत्र का हर पाया बेमानी है । और लोकतंत्र के हर पाये के संवैधानिक अधिकारो को बचाने के लिये राजनितक सत्ता होनी चाहिये । 2019 में देश के सामने  ये चुनौती है कि लोकतंत्र के किस नैरेटिव को वह पंसद करती है । क्योकि मोनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र की राह पर मोदी सत्ता है और संघ परिवार के स्वदेशी, खेती, किसानी और मजदूर की राह पर काग्रेस है । नौरेटिव साफ है काग्रेस ने मनमोहन सिंह के इक्नामी का रास्ता छोडा है लेकिन पोस्टर ब्याय मनमोहन सिंह को ही रखा है । तो दूसरी तरफ मोदी सत्ता अर्थवयवस्था के उस चक्रव्यूह में जा फंसी है जहा खजाना खाली है पर वोटरो पर लुटाने की मजबूरी है । यानी राजकोषिय घाटे को नजरअंदाज कर सत्ता को बरकरार रखने के लिये ग्रामीण भारत के लिये लुटाने  की मजबूरी है ।
इस कडी में सबसे महत्वपूर्ण और आखरी चुनौती है सत्ता के लिये बनती 2019 की वह बिसात जो 2014 की तुलना में  360 डिग्री में घुम चुकी है । इसकी परते एक्सीडेटल प्राइम मनीस्टर मनमोहन सिंह से ही निकली है । मनमोहन सिंह या नरेन्द्र मोदी , दोनो दो ध्रूव की तरह राजनीतिक बिसात बता रहे है । क्योकि एक तरफ एक्सडेटल पीएम मनमोहन सिंह को लेकर उस थ्योरी का उभरना है जहा पीएम होकर भी मनमोहन सिंह काग्रेस पार्टी के सामने कुछ भी नहीं थे । यानी हर निर्णय काग्रेस पार्टी-संगठन चला रही सोनिया और राहुल गांधी थे ।  तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी की थ्योरी है जहा पीएम के सामने ना पार्टी का कोई महत्व है ना ही सांसदो का और ना ही कैबिनेट मनीस्टरो का । तो अपने ही वोटरो से कट चुके बीजेपी सांसद या मंत्री की भूमिका 2019 में होगी क्या ये भी सवाल है । यानी एक तरफ सत्ता और पार्टी का बैलेस है तो दूसरी तरफ सत्ता का एकाधिकार है । तो 2018 बीतेत बीतते ये संदेश भी दे चुका है  कि 2019 के चुनाव में बीजेपी ही नहीं संघ परिवार के सामने भी ये चुनौती है कि उसे सत्ता गंवानी है या बीजेपी को बचाना है । गडकरी की आवाज इसी की प्रतिध्वनी है । तो दूसरी तरफ सोशल इंजिनियरिंग की जो थ्योरी काग्रेस से निकल कर बीजेपी में समायी अब वह भी आखरी सांस ले रही है । क्षत्रपो के सामने खुद को बचाने के लिये बीजेपी के खिलाफ एकजूट होकर काग्रेस की जमीन को मजबूत करना भी है । और आखिर तक मोदी सत्ता से जुडकर अपनी जमीन को खत्म करना भी है । यानी चाहे अनचाहे मोदी काल ने 2019 के लिये एक ऐसी लकीर खिंच दी है जहा लोकतंत्र का मतलब भी देश को समझना है और संविधान को भी परिभाषित करना है । इक्नामी को भी संभालना है और राजनीति सत्ता को भी जन-सरोकार से जोडना है । 

बुधवार, 2 जनवरी 2019

दिलीप कुमार ने कादर खान के हुनर को पहचाना तो कादर खान ने अमिताभ को अपने हुनर से नवाजा


 जन्म काबुल में । पिता कंधार के । बचपन मुफलिसी मे बीता ।  संघर्ष जिन्दगी की पहचान थी । 1973 में फिल्म दाग से फिल्मी सफर की शुरुआत हुई । पहचान डायलाग डिलिवरी की बनी । फिल्म कोई भी हो । स्किरप्ट राइटर कोई भी हो लेकिन खुद के डायलाग खुद ही लिखेगें । और डायलाग इतने असरदार की फिल्मो की पहचान ही डायलाग किसने लिखा इससे भी बनने लगी । और उस शख्स की मौत की खबर जब बरस के पहले ही दिन आई तो 70-80 के दशक में फिल्मो के शौकिनो में नास्टालाजिया छा गया । जाहिर है जिसने भी 70-80 के दशक को लडकपन में जिया है । स्कूल से भाग कर फर्स्ट डे फस्ट शो देखा है उसके लिये नायको की छवि के बीच चाहे अनचाहे ये शख्स रगो में दौडने लगा । फिर चाहे नायको की कतार में दिलीप कुमार हो या राजेश खन्ना य़ा फिर अमिताभ बच्चन या गोविन्दा ही क्यो ना हो  । चाहे-अनचाहे इस शख्स की अदाकारी और स्क्रिन पर डायलग डिलिवरी की टाइमिंग और हास्य की अदाकारी मौत की खबर के साथ काकटेल बन कर हर जहन में समायी जरुर । लेकिन कल्पना किजिये जिन्दगी को जिस अंदाज में किसी शख्स ने बचपन में अपनाया हो और मौका मिला तो अपनी भोगी हुई जिन्दगी को डायलाग के आसरे पर्दे पर उभार दिया । और देखने वालो ने इसे दिल से महसूस किया । लेकिन इस समझ को बहुत कम लोग जानते होगें कि जिन हालातो को कादर खान के पिता ने अफगानिस्तान में रहते हुये जिया उस दौर अतिवामपंथी सोच रुसी और चीनी मिजाज को जीते हुये अफगानिस्तान भी पहुंची थी । यानी गुलामी के दौर में वर्ग संघर्ष का अनकहा सच । कादर खान को तो उनकी मां लेकर बंबई आ गई क्योकि उससे पहले कादर खान के तीन भाई अफगानिस्तान में जन्म के चंद दिनो में ही मर चुके थे । तो जगह हालात बदलने की ख्नाइश समेटे कादर खान की मां इकबाल बेगम बंबई आई । पर जिन्दगी की जद्दोजहद में कादर खान को बंबई के रंग नहीं मिले बल्कि खुद की खामोशी और हालात के संघर्ष ने कब्रिस्तान में ढकेल दिया । जहा घंटो कादर खान बैठे रहते । वहा उनकी आवाज कोई सुनने वाला नहीं था तो अपने भीतर के आक्रोष को जोर जोर से बोलने में कोई परेशानी भी नहीं थी । वाकई ये किसी को भी अजब लग सकता है कि कैसे कोई बच्चा कब्रिस्तान या कहे शमशान में बैठ कर अपने भीतर के सवालो को बोल बोल कर बाहर करता होगा । पर ये हकीकत है कि कब्रिस्तान के माहौल ने बालक कादर खान की  जिन्दगी में बंबई के रंग भर दिये । रंगो के खोने के बाद कब्रिसतान में कभी किसी ने बालक कादर खान को चिल्लाते हुये देखा । अपने भीतर के सवालो से जुझते कादर खान के बोल में किसी को नाटकियता दिखायी दी तो किसी को हकीकत के शब्द सुनायी दिये । और इसी कडी में उस दौर में थियेटर के कलाकार अशरफ खान ने कादर खान से पूछ लिया अभिनय करोगे । अभिनय तो किया ही नहीं है । जानता भी कुछ नहीं हूं । कोई बात नहीं अदाकारी सीखी नहीं जाती सिर्फ डायलाग याद करने होते है । और लंबे लंबे डायलाग याद कर बोलने होते है । ये तो बहुत आसान है । और संभवत इतने ही संवाद के बाद अशरफ खान कब्रिस्तान से कादर खान को उस माहौल में ले गये जो बाप के संघर्ष और कब्रिस्तान की खामोशी से बिलकुल अलग था । और कादर खान का मतलब क्या हो सकता है ये और किसी ने नहीं पहली बार दिलीप कुमार ने महसूस किया । क्योकि नाटको को करते वक्त कादर खान के डायलग बोलने के अंदाज को युसुफ भाई यानी दिलीप कुमार ने महसूस किया । किसी के कहने पर दिलीप कुमार जब कादर खान के डायलग बोलने के अंदाज को देखने-सुनने थियेटर पहुंचे । नाटक के दौरान दिलीप कुमार ने महसूस किया कि कादर खान उम्र से कही ज्यादा परिपकिव हो । तो नाटक खत्म होने के बाद कादर खान को अपने साथ फिल्म में काम करने का आफर देने से नहीं चुके । उस दौर में दिलीप कुमार को लेकर तपन सिन्हा ने सगीना फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी थी । जेके कपूर फिल्म प्रोड्यूस कर रहे थे । कमोवेश शूटिंग शुरु होने वाली थी । पर कादर खान के डायलाग डिलिवरी को देखकर दिलीप कुमार ने खास तौर पर पूरी फिल्म में सिर्फ एक डायलाग की जगह कादर खान के लिये तपन सिन्हा को बोलकर निकाली । अल्ट्रा लेफ्ट के आंदोलन और वर्ग संघर्ष के बीच एक गरीब मजदूर के संघर्ष को दिखलाती इस फिल्म में सिर्फ दिलीप कुमार ही नहीं बल्कि अनिल चटर्जी और कल्याण चटर्जी  के साथ अपर्णा सेन सरीखे कलाकर थे जो फिल्म में अतिवाम आंदोलन चला रहे थे । लेकिन उनके नेता के तौर पर कादर खान की इन्ट्री वैचारिक तौर पर सगीना फिल्म की ही नहीं बल्कि सगीना महतो के चरित्र को जीते दिलीप कुमार को भी परिभाषित करते है । महज नब्बे सेकेंड के डायलाग में बतौर लीडर कादर खान का संबोधन और वामपंथी नेता की भूमिका में सवाल करते बंगाली थियेटर के महान कलाकार अनिल चटर्जी  थे । तो कल्पना किजिये 1974 के फिल्म सगीना में कादर खान को कैसे डायलाग के लिये दिलीप कुमार तैयार करते है और तपन सिन्हा कादर खान के लिये कौन सा डायलाग लिखते है । कुछ इस तरह है फिल्मी अंदाज.... " आज मै आप लोगो के सामने एक साधारण मजदूर  की बात करना चाहता हूं जिसकी छाती में एक शेर का दिल है । जो गरीब है । लेकिन जिसके अलफाज परिवर्तन की वादी में बदलते है ।उसका नाम है सागीना महतो । सगीना दो रुपये रोज का मजदूर है । लेकिन करोडो की लागत से बनी जिस कंपनी में वह काम करता है वह उसके नाम से डरती है । इसीलिये सगीना जैसे लोगो की हमारे संगठन में जरुरत है । इसलिये हमारे नये साथी वहा जाये और उसे संगठन में शामिल करने का प्रयास करें ।
 [ अनिल चटर्जी ] सगीना के मुताल्लिकात ये भी मशहूर है कि उसे शराब की लत और लंफंगेपन की आदत है ।
[कादर खान ] लफगें वह विदेशी कैपटलिस्ट है जो सदियो से गरीब मजदूर जनता का खून पीते आये है । सगीना को अगर शराब की लत है तो उसे हम धिक्कार कर अलग नहीं कर सकते ।
[ अनिल चटर्जी ] ठीक है शराबी को भी हम अपनी छाती से लगा लेगें जरुर लेकिन उसके बाद हमारी जंग के अंजाम का क्या होगा ।
[  कादर खान ] अगर इस जंग में कामयाबी हमारी नियम है अनीरुद्द बाबू तो हमे इस देश के हर सागीना को अपने साथ लाना होगा । ये लडाई गरीब मजदूर जनता की लडाई है । ये लडाई सगीना महतो की लडाई है ।
और पूरी फिल्म में कादर खान का ये डायलाग दिलीप कुमार के कद को बढाती है । वाम संघर्ष को पैनापन देती है । तो क्या आजाद भारत में जब राजेश खन्ना का दौर था । प्रेम काहनियां हर दिल अजीज थी तब वाम संघर्ष को लेकर या कहे वर्ग संघर्ष के आसरे सागीना महतो को तपन सिन्हा ने रचा । ये समाज के भीतर के विद्रोही पन का इभार था   और इसी कडी में याद किजिये फिल्म मुक्कदर का सिकंदर । पूरी फिल्म अमिताभ बच्चन के ही इद्र गिर्द रेगती है । हालाकि फिल्म कई महान कलाकार है । विनोद खन्ना और अमजद खान तक । पर फिल्म के शुरु में अमिताभ ते लिय़े जो डायलाग कादर खान बोलते है वह पूरी फिल्म में अमिताभ का पिछा करती रहती है । और संयोग से ये डायलाग डिलिवरी कब्रिस्तान में है । यानी चाहे अनचाहे कादर खान खुद से [ बचपन की याद ]  बाहर 1978 में रिलिज हुई फिल्म मुकद्दर का सिक्दंर के वक्त तक बाहर निकल नहीं पाये थे । तो कब्रिसतान में बालक अमिताभ बच्चन जब अपनी मां को लेकर पहुंचते है । और रो रहे है तब फकीर के तौर पर कादर कान की इन्ट्री होती है । और डायलग के ब्द इसलिये महत्वपूर् है क्योकि इसे कादर खान ने ही लिखा । जरा अंदाज देखिये...." किसकी कब्र पर रो रहे है।
[  बालक ] हमारी मां मर गई है ।
[कादर खान] देखो चारो तरफ देखो । इनमे भी कोई किसी की मां । कोई किसी की बहन है । कोई किसी का भाई है । पर शबो गम में मिट्टी के नीचे सभी दबे पडे है । '  मौत पर किसकी रिश्तेदारी है , आज इनकी तो कल हमारी बारी है ।
 ' बेटे इस फकीर की एक बात याद रखना , जिन्दगी का अगर सही लुप्फ उठाना है तो मौत से खेलो । सुख में हंसते हो तो दुख में कहकहे लगाओ । जिन्दगी का अंदाज बदल जायेगा ।
 " जिन्दा है वो लोग जो मौत से घबराते है , मुर्दो से बदतर है वो लोग जो मौत से घबराते है । "
सुख को ठोकर मार , दुख को अपना । अरे सुख तो बेवफा है , चंद दिनो के लिये आता है और चला जाता है । पर दुख तो अपना साथी है , अपने साथ रहता है ।
पोछ ले आंसू....पोछ ले आसूं । दुख को अपना लें । तकदीर तेरे कदमों में होगी , तू मुकद्दर का बादशाह होगा .......
और इस लंबे डायलाग के बाद स्क्रिन पर अमिताभ की इन्ट्री होती है जहा वह गीत बजता है ....रोते हुये आते है सब ..हंसता हुआ तू जायेगा ....मुकद्दर का सिंकदर कहलायेगा  ।
उस दौर में शोले और बाबी के बाद सबसे कमाई वाली फिल्म मुकद्दर का सिकंदर ही रही । और सोवियत संघ में जब इस फिल्म ने घूम मचायी तो रुसी कादर खान के डायलाग ही ज्यादा बोलते सुनाई दिये ।
मौत की खबर ने अमिताभ बच्चन को कितना विचलित किया ये 2018 के आखरी दिन मौत की गलत खबर आने पर भी अमिताभ ने ट्विट कर बेटे सरफराज के हवाले से सही खबर की जानकारी दी । और अगले ही दिन यानी बरस बदलते ही 2019 की पहली खबर कादर खान की मौत की आई तो अपनी सफल फिलमो की कतार में कादर खान को मान्यता देने से भी अमिताभ ट्विट करने से नहीं चूके । लेकिन जिन दो कलाकारो की याद ऐसे मौके पर आई उसमें एक कलाकार राजेश खन्ना तो है नहीं लेकिन फिल्म रोटी समेत आधे दर्जन फिल्मो में कादर खान के लिखे शब्द ही राजेश खन्ना ने बोले और सुनने वालो ने तालिया बजायी  लेकिन युसुफ भाई [ दिलीप कुमार ] तो जिन्दा है  पर वह उम्र के जिस पडाव पर है और जिस बिमारी से ग्रस्त है । उसमें वह अपनी कोई प्रतिक्रिया तो दे नहीं पायेगें और ना ही दे पाये । लेकिन फिल्म सागीना में तो सायरा बानो भी थी । और अगर सायरा बानो  ने दिलीप कुमार को कादर खान की मौत की जानकारी दी होगी तो आंखो में आंसू तो दिलीप कुमार के भी भर आये होगें  ।

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

दस घंटे के भीतर कर्ज माफी के एलान का मतलब....



ना मंत्रियों का शपथ ग्रहण ना कैबिनेट की बैठक । सत्ता बदली और मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही किसानो की कर्ज माफी के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये । ये वाकई पहली बार है कि राजनीति ने इक्नामी को हडप लिया या फिर राजनीतिक अर्थशास्त्र ही भारत का सच हो चला है । और राजनीतिक सत्ता के लिये  देश की इक्नामी से जो खिलावाड बीते चार बरस में किया गया उसने विपक्ष को नये संकेत यही दे दिये कि इक्नामी संभलती रहेगी पहले सत्ता पाने और फिर संभालने के हालात पैदा करना जरुरी है । हुआ भी यही कर्ज में डूबे मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ की सत्ता पन्द्रह बरस बाद काग्रेस को मिली तो बिना लाग लपेट दस दिनो में कर्ज माफी के एलान को दस घंटे के भीतर कर दिखाया और वह सारे पारंपरिक सवाल हवा हवाई हो गये कि राज्य का बजट इसकी इजाजत देता है कि नहीं । दरअसल , मोदी सत्ता ने जिस तरह सरकार चलायी है उसमें कोई सामान्यजन भी आंखे बंद कर कह सकता है कि नोटबंदी आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक फैसला था । जीएसटी जिस तरह लागू किया गया वह आर्थिक नहीं राजनीतिक फैसला है । रिजर्व बैक में जमा तीन लाख करोड रुपया बाजार में लगाने के लिये माग करना भी आर्थिक नहीं राजनीतिक जरुरत है । पहले दो फैसलो ने देश की आर्थिक कमर को तोडा तो रिजर्व बैक के फैसले ने ढहते इकनामी को खुला इजहार किया । फिर बकायदा नोटबंदी और जीएसटी के वक्त मोदी सरकार के मुख्यआर्थिक सलाहकार रहे अरविन्द सुब्रमणयम ने जब पद छोडा तो बकायदा किताब  [ आफ काउसंल, द चैलेज आफ मोदी-जेटली इक्नामी   ]  लिखकर दुनिया को बताया कि नोटबंदी का फैसला आर्थिक विकास के लिये कितना घातक था । और जीएसटी ने इक्नामी को कैसे उलझा दिया । तो दूसरी तरफ काग्रेस के करीबी माने जाने वाले रिजर्व बैक के पूर्व गर्वनर रधुरामराजन का मानना है कि किसानो की कर्ज माफी से किसानो के संकट दूर नहीं होगें । और संयोग से जिस दिन रधुरामराजन ये कह रहे थे उसी दिन मध्यप्रदेश में कमलनाथ तो छत्तिसगढ में भूपेश बधेल सीएम पद की शपथ लेते ही कर्ज माफी के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर रहे थे । तो सवाल तीन है । पहला , क्या राजनीति और इक्नामी की लकीर मिट चुकी है । दूसरा , क्या 1991 की लिबरल इक्नामी की उम्र अब पूरी हो चुकी है । तीसरा , क्या ग्रामिण भारत के मुश्किल हालात अब मुख्यधारा की राजनीति को चलाने की स्थिति में आ गये है । ये तीनो सवाल ही 2019 की राजनीतिक बिसात कुछ इस तरह बिछा रहे है जिसमें देश अब पिछे मुडकर देखने की स्थिति में नहीं है । और इस बिसात पर  सिर्फ 1991 के आर्थिक सुधार ही नहीं बल्कि मंडल-कंमडल से निकले क्षत्रपो की राजनीति भी सिमट रही है । पर कैसे राजनीति और अर्थव्यवस्था की लकीर मिटी है और वैकल्पिक राजनीतिक अर्थसास्त्र कीा दिशा में भारत बढ रहा है ये काग्रेस के जरीये बाखूबी समझा जा सकता है । काग्रेस मोदी सत्ता के कारपोरेट प्रेम को राजनीतिक मुद्दा बनाती है । किसानो की कर्ज माफी और छोटे और मझौले उघोगो के लिये जमीन बढाने और मजदूरो के हितो के सवाल को मनरेगा से आगे देखने का प्रयास कर रही है । जबकि इन आधारो का विरोध  मनमोहनइक्नामिक्स ने किया । लेकिन अब काग्रेस कृर्षि आर्थसास्त्र को समझ रही है लेकिन उसके पोस्टर ब्याय और कोई नही मनमोहन सिंह ही है ।
यानी तीन राज्यो में जीत के बाद करवट लेती राजनीति को एक साथ कई स्तर पर देश की राजनीति को नायाब प्रयोग करने की इजाजत दी है । या कहे खुद को बदलने की सोच पैदा की है । पहले स्तर पर काग्रेस रोजगार के साथ ग्रोथ को अपनाने की दिशा में बढना चाह रही है । क्योकि लिबरल इक्नामी के ढाचे को मोदी सत्ता ने जिस तरह अपनाया उसमें ' ग्रोथ विदाउट जाब '  वाले हालात बन गये । दूसरे स्तर पर विपक्ष की राजनीति के केन्द्र में काग्रेस जिस तरह आ खडी हुई उसमें क्षत्रपो के सामने ये सवाल पैदा हो चुका है कि वह बीजेपी विरोध करते हुये भी बाजी जीत नहीं सकते । उन्हे काग्रेस के साथ खडा होना ही होगा । और तीसरे स्तर पर हालात ऐसे बने है कि तमाम अंतर्विरोध को समेटे एनडीए था जिसकी जरुरत सत्ता थी पर अब यूपीए बन रहा है जिसकी जरुर सत्ता से ज्यादा खुद की राजनीतिक जमीन को बचाना है । और ये नजारा तीन राज्यो में काग्रेस के शपथ ग्रहण के दौरान विपक्ष की एक बस में सवार होने से भी उभरा और मायावती, अखिलेश और ममता के ना आने से भी उभरा ।
दरअसल, मोदी-शाह की बीजेपी ममता बर क्षत्रपो की राजनीतिक जमीन को सत्ता की मलाई  और जांच एंजेसियो की धमकी के जरीये तरह खत्म करना शुरु किया । तो क्षत्रपो के सामने संकट है कि वह बीजेपी के साथ जा नहीं सकते और काग्रेस को अनदेखा कर नहीं सकते । लेकिन इस कडी में समझना ये भी होगा कि काग्रेस का मोदी सत्ता या कहे बीजेपी विरोध पर ही तीन राज्यो में काग्रेस की जीत का जनादेश है । और इस जीत के भीतर मुस्लिम वोट बैक का खामोश दर्द भी छुपा है । कर्ज माफी से ओबीसी व एससी-एसटी समुदाय की राजत भी छुपी है और राजस्थान में जाटो का पूर्ण रुप से काग्रेस के साथ आना भी छुपा है । और इसी कैनवास को अगर 2019 की बिसात पर परखे तो क्षत्रपो के सामने ये संकट तो है कि वह कैसे काग्रेस के साथ काग्रेस की शर्ते पर नहीं जायेगें । क्योकि काग्रेस जब मोदी सत्ता के विरोध को जनादेश में अपने अनुकुल बदलने में सफल हो रही है तो फिर क्षत्रपो के सामने ये चुनौती भी है कि अगर वह काग्रेस के खिलाफ रहते है तो चाहे अनचाहे माना यही जायेगा कि वह बीजेपी के साथ है । उस हालात में मुस्लिम , दलित , जाट या कर्ज माफी से लाभ पाने वाला तबको क्षत्रपो  का साथ क्यो देगा । यानी तमाम विपक्षी दलो की जनवरी में होने वाली अगली बैठक में ममता , माया और अखिलेश भी नजर आयेगें । और अब बीजेपी के सामने चुनौती है कि वह कैसे अपने सहयोगियो को साथ रखे और कैसे  लिबरल इक्नामी का रास्ता छोड वैकल्पिक आर्थिक माडल को लागू करने के लिये बढे । यानी 2019 का राजनीतिक अर्थशास्त्र अब  इबारत पर साफ साफ लिखी जा रही है कि कारपोरेट को मिलने वाली सुविधा या रियायत अब ग्रमीण भारत की तरफ मुडेगी । यानी अब ये नहीं चलेगा कि उर्जित पटेल ने रिजर्व बैक के गवर्नर पद से इस्तिफा दिया तो शेयर बाजार सेसंक्स को कारपोरेट ने राजनीतिक तौर पर शक्तिकांत दास के गवर्नर बनते ही संभाल लिया क्योकि वह मोदी सत्ता के इशारे पर चल निकले । और देश को ये मैसेज दे दिया गया कि सरकार की इक्नामिक सोच पटरी ठीक है उर्जित पटेल ही पटरी पर नहीं थे ।