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रविवार, 20 जनवरी 2019

महाभारत की चौसर छोटी है 2019 के महासमर के सामने ...

महाभारत की चौसर छोटी है 

2019 के महासमर के सामने ...




महासमर या महाभारत । 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल जिस लकीर को खिंच रहे है वह सिर्फ राजनीति भर नहीं है । सत्ता हो या विपक्ष दोनो के पांसे जिस तरह फेंके जा रहे है वह जनादेश के लिये समर्थन जुटाने का मंत्र भी नहीं है । बल्कि महासमर या महाभारत की गाथा एक ऐसे दस्तावेज को रच रही है जिसमें संविधान और लोकतंत्र की परिभाषा आने वाले वक्त में सत्ता के चरणो में नतमस्तक रहेगी इंकार इससे भी किया नहीं जा सकता है । 



और जो रचा जा रहा है उसके तीन चेहरे है । पहला , चुनावी तंत्र का चेहरा । दूसरा  कारपोरेट लूट की पालेटिकल इक्नामी । तीसरा जन सरोकार या जन अधिकार को भी सत्ता की मर्जी पर टिकाना । रोचक तीनो है , पर देश के लिये घातक भी तीनो है । और देश के  सामाजिक-आर्थिक हालातो के बीच लोकतंत्र की त्रासदी के तौर पर तीनो ही अपनी अपनी सत्ता को संभाले भी हुये है । कोलकत्ता में ममता की रैली   [ रैली पर खर्च किया गया रुपया जनता का ही है ] में गठबंधन की छतरी तले विपक्ष का हुजुम पहली नजर में साफ साफ दिखा देता है कि बीजेपी से किसी की दुश्मनी नहीं है । टारगेट पर नरेन्द्र मोदी  है जिन्होने अपनी कार्यशैली से देश मेंउस लोकतंत्र को ही खत्म कर दिया जो संसदीय राजनीति के नारे तले हर राजनीतिक दल के  जीने का हक [ जन अधिकार की बात करने वाले भी और जन की पूंजी की लूट करने वाले भी ] देती है । या फिर संविधान की परिभाषा सत्तानुकुल कर चुनी हुई सत्ता को संविधान के भी उपर बैठा दिया । और कानूनी या संवैधानिक तौर अगर ये काम इंदिरा गांधी ने इमरजेन्सी ला कर किया तो नरेन्द्र मोदी ने बिना इमरजेन्सी के उस सच को उभार दिया जिसे कहने या उभारने से हर सत्ता अपने अपने दायरे में इससे पहले बचती रही है । यानी 2019 के महाभारत का पहला सच ममता की रैली से यही उभरा कि अगर सत्ता 2019 में पलट गई तो फिर मोदी को कोई बख्शेगा नहीं । और इसका खुला इजहार भी हुआ कि मोदी सत्ता ने सोनिया से लेकर ममता । अखिलश से लेकर मायावती । तेजस्वी से लेकर हार्दिक पटेल तक को नहीं बख्शा तो फिर सत्ता पलटने पर मोदी को भी बख्शा नहीं जायेगा  ।  लेकिन  राजनीतिक मंत्र सिर्फ राजनीतिक दुश्मनी के तहत ही सभी को एक छतरी तले लेते आया , सच ये भी नहीं है । हकीकत तो ये है कि अक बडी छतरी तले छोटी छोटी छतरियों को थामे विपक्ष है । 





जो 2019 के जनादेश के बाद तीन परिस्थियो को परख रहा है । जिसमें एक तरफ बीजपी या काग्रेस को समर्थन देने की स्थिति है । यानी तमाम क्षत्रप सत्ता की मलाई खाने के लिये काग्रेस के साथ जायेगें । या फिर मोदी माइनस बीजेपी को भी समर्थन देने की स्थिति में आ जायगें । दूसरी परिस्थिति ज्यादा रोचक है जिसमें क्षत्रपो का गठबंधन की अपने में से किसी नेता को चुन लें और काग्रेस या बीजेपी उस समर्थन दे दें । लेकिन सबसे ज्यादा रोचक तीसरी परिस्थिती है जिसके केन्द्र में मायावती है । जो अपनी सीटो की संख्या तले खुद ही पीएम का दावेदार बन कर काग्रेस या बीजेपी से कहे कि उसके पीछ वह अपनी ताकत [ सासंदो की संख्या ] झोंक दें । दरअसल इस तीसरी परिस्थति में कई परते है । पहला तो यही कि अखिलेश यादव भी सीटो की संख्या में मायावती से जा से कम रहेगें तो फिर पहला समझौता माया-अखिलेश में होगा । कौन राज्य सभाले और कौन केन्द्र संभाले । इस समझौते के तहत अखिलेश का झुकाव काग्रेस के पक्ष में होगा । लेकिन इस गणित की दूसरी परत ये भी कहती है कि मायावती के सामानातंर अगर ममता भी बंगाल में कमाल कर देती है तो फिर ममता खुद को उन क्षत्रपो के साथ जोडकर पीएम उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट करेगी जिनके सबंध ममता से करीब है । उसमें केजरीवाल भी है और फारुख अब्दुल्ला भी । चन्द्रबाबू भी हामी भर सकते है और केसीआर भी । यानी बडी छतरी तले कई छतरिया ही नहीं बल्कि छतरियो के भीतर भी छतरियो का ऐसा समझौता जो महाभारत की चौसर को भी मात कर दें । लेकिन इस राजनीतिक मंत्र का सियासी मिजाज साफ है 2019 में ऐसा परिवर्तन जिसमें बीजपी और मोदी की सत्ता को एक साथ ना देखा जाये ।   




पर राजनीतिक महासमर के इस खेल में कारपोरेट लूट की पालेटिकल इकनामी का चेहरा भी कम रोचक नहीं है । क्योकि जिस दौर में सरकारी खजाने को रिजर्व बैक से तीन लाख करोड की जरुरत पड गई उस दौर में अंबानी की कंपनी को आखरी क्वाटर में 10 हजार करोड का शुद्द मुनाफा हो जाता है । इंटरकाम के क्षेत्र में एयरटेल समेत तमाम कंपनिया रिस रह है लेकिन जियो को 28 फिसदी का लाभ हो जाता है । और कोलकत्ता में ममता की रैली से ये आवाज भी खुले तौर पर निकलती है कि सत्ता अंबानी का पाल पोस रही है । यानी देश की एवज में पंसदीा कारपोरेट को लाभ पहुंचाने के तमाम रास्ते खोल रही है । और फिर 2013 के हालातो में जब नरेन्द्र मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाया जाये या नहीं या फिर आडवाणी के विरोध के स्वर को भी कारपोरेट की पूंजी तले तौलने का काम 2019 में ये कहकर शुरु हो गया कि तब बीजेपी-संघ के भीतर से आवाज यही थी कि जो पूंजी लगायेगा वहीं पीएम उम्मीदवार होगा । और तब कारपोरेट ने ही नरेन्द्र मोदी का नाम लेना शुरु कर दिया । गुजरात माडल को राजनीतिक माडल बनाया गया । और आडवाणी सवाय विरोध के तब कुछ कर ना सके । और देश ने 2014 के चुनाव की चकाचौंध का मिजाज नरेन्द्र मोदी की प्रचार शैली [ तकनीकी प्रचार  ] से लेकर सैकडो हवाई रैली करते हुये भी हर रात वापस गांधीनगर पहुंचने की देखी । और उसके बाद सत्ता की तरफ से चुनाव में मदद करने वाले कारपोरेट को लाभालाभ देने की देश की नीतियो को भी खनन से लेकर पोर्ट और पावर सेक्टर से लेकर टेलीकाम तक में देखा । तो क्या 2019 के महाभारत के लिये बिछती चौसर पर कारपोरेट को अपने अनुकुल करने या मोदी सत्ता से लाभ लेने वाले कारपोरेट को सत्ता बदलने पर ना बख्शने का पांसा फेका जा रहा है । 





या फिर जिन कारपोरेट को लूट का मौका मोदी सत्ता में नहीं मिला उन्हे सत्ता परिवर्तन के बाद लाभ के हालात से जोडने के लिये पैसे फेके जा रहे है ।
लेकिन 2019 के महाभारत में सबसे परेशान वाला तीसरा चेहरा है जो जन-सरोकार या जन अधिकार की बात को ही सत्ता की दौड तले खत्म कर देता है । यानी सत्ता कैसे संविधान है । सत्ता ही कैसे लोकतंत्र की परिभषा है । और सत्ता ही कैसे हिन्दुस्तान है । ये संवैधानिक पद पर बैठे नरेन्द्र मोदी की कार्यशौली भर का नतीजा नहीं है बल्कि सत्ता केन्द्रित लोकतंत्र में कैसे राजनीतिक दलो की कार्यशैली भी सिर्फ सत्ता के भरोसे ही लोगो को जिन्दा रहने या जिन्दा रहने की सुविधा/नीतियो को टिकाती है ये भी काबिलेगौर है । और ये वाकई बेहद त्रासदी पूर्ण है कि मान्यता तभी मिलती है जब सत्ता का हाथ सर पर हो । यानी जो मोदी की सत्ता में मोदी के साथ खडे है और कल जब मोदी की सत्ता नहीं होगी तब की सत्ता में जो सत्ता के साथ खडे होगें , मान्यता उन्ही की होगी । बाकि सभी कीडे-मकौड की तरह रहे , जीये या खत्म हो जाये कोई फर्क नहीं पडता । इसका नजारा कई दृश्टी से हो सकता है । पर उदाहरण के लिये लगातार किसानो के बीच काम कर रहे लोगो को ही ले लिजिये । दो महीने पहले दिल्ली में किसानो का जमघट मोदी सत्ता की किसान विरोधी नीतियो को लेकर हुआ । दिल्ली में किसानो के तमाम संगठन जुटे इसके लिये तमाम समाजसेवी से लेकर पत्रकार पी साईनाथ ने खासी मेहनत की । पर दिल्ली में सजा मंच इंतजार करता रहा कि तमाम राजनीतिक दलो के चेहरे कैसे मंच पर पहुंच जाये । और जब संसद के अंदर बाहर चमकते चेहरे मंच पर पहुंचे और किसानो के हितो की बात कहकर हाथो में हाथ डाल कर अपनी एकता दिखाते रहे तो इसे ही सफल मान लिया गया । और कोलकत्ता में ममता की रैली में जब नेताओ का जमावडा जुटा तो किसानो के बीच काम कर रहे योगेन्द्र यादव कोलकत्ता से दो सौ किलोमिटर दूर एक सामान्य सी सभा को बंगाल में ही संबोधिक तर रहे थे । पर उनका कोई अर्थ नहीं क्योकि सत्ता के सितारे तो कोलकत्ता में जुटे थे । यानी महत्ता तभी होगी जब आप सत्ता केन्द्रित सियासत के साझीदार बन जाये । वरना आप हो कर भी कही नहीं है । तो कया देश के सारे रास्ते सत्ता में जा सिमटे है और पत्रकार कहलाने के लिये । अच्छा शिक्षक , वकील , डाक्टर , लेखक , सामजसेवी होने के लिये या तो सत्ता से सट जाये या फिर चुनाव मैदान में कूद जाये । और देश का मतलब राजनीति सत्ता ही है । ध्यान दिजिये हो तो यही रही है ।
और जो सत्ताधारी है उनके लिये आखरी मंत्र....अटलबिहारी वाजपेयी के दौर में प्रमोद महाजन बेहद ताकतवर हो गये थे । नरेन्द्र मोदी के दौर में अमित शाह बेहद ताकतवर है । तो ताकत का मतलब क्या है ये भी समझे ।     

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

जेटली एक फरवरी तक न्यूयार्क से नहीं लौटे तो कौन पेश करेगा बजट ?

जेटली एक फरवरी तक न्यूयार्क से नहीं लौटे तो कौन पेश करेगा बजट ?



इस बार एक फरवरी को बजट पेश कौन करेगा । जब वित्त मंत्री कैंसर के इलाज के लिये न्यूयार्क जा चुक है ।  क्या 31 जनवरी को पेश होने वाले आर्थिक समीक्षा के आंकडे मैनेज होगें । जिसके संकेत आर्थिक सलाहकार के पद से इस्तिफा दे चुके अरविंद सुब्रहमण्यम ने दिये थे । क्या बजटीय भाषण इस बार प्रधानमंत्री ही देगें । और आर्थिक आंकडे स्वर्णिम काल की तर्ज पर सामने रख जायेगें । क्योकि आम चुनाव से पहले संसद के भीतर मोदी सत्ता की तरफ से पेश देश के आर्थिक हालातो को लेकर दिया गया भाषण आखरी होगा । इसके बाद देश उस चुनावी महासमर में उतर जायेगा जिस महासमर का इंतजार तो हर पांच बरस बाद होता है लेकिन इस महासमर की रोचकता 1977 के चुनाव सरीखी हो चली है । याद किजिये 42 बरस पहले कैसे जेपी की अगुवाई में बिना पीएम उम्मीदवार के समूचा विपक्ष एकजूट हुआ था । और तब के सबसे चमकदार और लोकप्रिय नेतृत्व को लेकर सवाल इतने थे कि जगजीवन राम जो की आजाद भारत में नेहरु की अगुवाई में बनी पहली राष्ट्रीय सरकार में सबसे युवा मंत्री थे वो भी काग्रेस छोड जनता पार्टी में शामिल हो गये । और 1977 में काग्रेस से कही ज्यादा  इन्दिरा गांधी की सत्ता की हार का जश्न ही देश में मनाया गया था । और संयोग ऐसा है कि 42 बरस बाद 2019 के लिये तैयार होते के सामने बीजेपी की सत्ता नहीं बल्कि मोदी की सत्ता है । यानी जीत हार बीजेपी की नहीं मोदी सत्ता की होनी है । इसीलिये तमाम खटास और तल्खी के माहौल में भी राहुल गांधी स्वस्थ्य लाभ के लिये न्यूयार्क रवाना होते अरुण जटली के लिये ट्विट कर रहे है । तो क्या मोदी सत्ता को लेकर ही देश की राजनीतिक बिसात हर असंभव राजनीति को नंगी आंखो से देख रही है । और इस राजनीति में इतना पैनापन आ गया है कि यूपी में सपा-बसपा के गंठबंधन में काग्रेस शामिल ना हो इसके लिये तीनो दलो ने मिल कर महागंठबंधन को दो हिस्सो में बांट दिया । जिससे बीजेपी के पास कोई राजनीतिक जमीन भी ही नहीं । यानी काग्रेस गंठबधन से बाहर होकर ना सिर्फ बीजेपी के अगडी जाति की पहचान को खत्म करेगी बल्कि जो छोटे दल सपा-बसपा-आरएलडी के साथ नहीं है , उन्हे काग्रेस अपने साथ समेट कर मोदी-शाह के किसी भी सोशल इंजिनियरिंग के फार्मूले को चुनावी जीत तक पहुंचने ही नहीं देगी । फिर ध्यान दें तो 2014 में सत्ता बीजेपी को मिलनी ही थी तो बीजेपी  के साथ गठंबधन के हर फार्मूले पर छोटे दल तैयार थे । लेकिन 2019 की बिसात में कश्मीर से कन्याकुमारी तक के हालात बताते है कि गठबंधन के धर्म तले मोदी-शाह अलग थलग पड गये है । सबसे पुराने साथी अकाली- शिवसेना से पटका पटकी के बोल के बीच रास्ता कैसे निकलेगा इसकी धार विपक्ष के राजनीतिक गठबंधन पर जा टिकी है । तो दूसरी तरफ गठबंधन बीजेपी को देक कर नहीं बल्कि मोदी सत्ता के तौर तरीको को देख कर बन रहा है । और इस मोदी सत्ता का मतलब बीजेपी सत्ता से अलग क्यो है इसे समझने से पहले गठबंधन का देशव्यापी चेहा परखना जरुरी है । टीडीपी काग्रेस का गठबंधन उस आध्रप्रदेश और तेलगाना में हो रहा है जहा कभी काग्रेस और चन्द्रबाबू में छत्तिस का आंकडा था । 



झारखंड में बीजेपी के साथ जाने के आसू भी तैयार नहीं है और झामुमो-आरजेडी-काग्रेस गठबंधन बन रहा है । बिहार-यूपी में मांझी, राजभर , कुशवाहा , अपना दल , आजेडी और काग्रेस की व्यूह रचना मोदी सत्ता के इनकाउंटर की बन रही है । और यही हालात महराष्ट्र और गुजरात में है जहा छोटे छोटे दल अलग अलग मुद्दो के आसरे 2014 में बीजेपी के साथ थे वह मोदी सत्ता को ही सबसे बडा मुद्दा मानकर अब अलग व्यूहरचना कर रह है । जिसेक केन्द्र में काग्रेस की बिसात है । जो पहली बार लोकसभा चुनाव और राज्यो क चुनाव में अलग अलग राजनीति करने और करवाने के लिये तैयार है । यानी लोकसभा चुनाव में काग्रेस राज्य चुनाव के अपने ही दुश्मनो से हाथ मिला रही है और काग्रेस विरोधी क्षत्रप भी अपने आस्त्तित्व के लिये काग्रेस से हाथ मिलाने को तैयार है । मोदी सत्ता के सामने ये हालात क्यो हो गये इसके उदाहरण तो कई दिये जा सकते है लेकिन ताजा मिसाल सीबीआई हो तो उसी के पन्नो को उघाड कर हालात परखे । आलोक वर्मा को जब सीबीआई प्रमुख बनाया गया तो वह मोदी सत्ता के आदमी के थे । और तब काग्रेस विरोध कर रही थी । उस दौर में सीबीआई ने मोदी सत्ता के लिये हर किसी की जासूसी की । ना सिर्फ विपक्ष के नेताओ की बल्कि बीजेपी के कद्दावर नेताओ की भी जासूसी सीबीआई ने ही । और सच तो यही है कि बीजेपी के ही हर नेता-मंत्री की फाइल जिसे सियासी शब्दो में नब्ज कहा जाता है वह पीएमओ के टेबल पर रही । जिससे एक वक्त के कद्दावर राजनाथ सिंह भी रेगते दिखायी पडे । और किसी भी दूसरे नेता की हिम्मत नहीं पडी कि वह कुछ भी बोल सके । यानी यशंवत सिन्हा यू ही सडक-चौराहे पर बोलते नहीं रहे कि बीजेपी में कोई है नहीं जो मोदी सत्ता पर कुछ बोल पाये । दरअसल इसका सच दोहरा है । पहला , हर की नब्ज मोदी सत्ता ने पकडी । और दूसरा राजनीतिक सत्ता किसी भी नेता में इतनी नैतिक हिम्मत छोडती नहीं कि वह सत्ता से टकराने की हिम्मत दिखा सके । और इसमें मदद सीबीआई की जाससी ने ही की । और सीबीआई की जासूसी करने कराने वाले कताकतवर ना हो जाये तो आलोक वर्मा के सामानांतर राकेश आस्थाना को ला खडा कर दिया गया । फिर इन दोनो पर नजर रखे देश के सुरक्षा सलाहकार की भी जासूसी हो गई । और एक को आगे बढाकर दूसरे से उसे काटने की इस थ्योरी में सीवीसी को भी हिस्सेदार बना दिया गया । यानी सत्ता के चक्रव्यू में हर वह ताकतवर संस्थान को संभाले ताकतवर शख्स फंसा जिसे गुमान था कि वह सत्ता के करीब है और वह ताकतवर है । जाहिर है इस खेल से विपक्ष साढे चार बरस डरा -सहमा रहा । सत्ताधारी भी अपने अपने खोल में सिमटे रहे । लेकिन विधानसभा चुनाव के जनादेश ने जब बीजेपी का बोरिया बिस्तर तीन राज्यो में बांध दिया तो फिर सीबीआई जांच के बावजूद अखिलेश यादव का डर सीबीआई से काफूर हो गया । केन्द्रीय मंत्री गडकरी उस राजनीति को साधने लगे जिस राजनीति के तहत उन्हे अध्यक्ष पद की कुर्सी अपनो के द्वारा ही छापा मरवाकर छुडवा दी गई थी । और धीरे धीरे इमानदारी के वह सारे एलान बेमानी से लगने लगे जो 2014 में नैतिकता का पाठ पढाकर खुद को आसमान पर बैठाने से नहीं चुके थे । क्योकि राफेल की लूट नये सिरे से सामने ये कहते हुये आई कि डिसाल्ट कंपनी जेनरेशन टू राफेल की किमत जेनेरेशन थ्री से कम में फ्रांस सरकार को जब बेच रही है तो फिर भारत ज्यादा किमत में जेनरेशन थरी राफेल कैसे करीद रहा है । इसीलिये 2019 में बजट को लेकर संसद का आखरी भाषण जिसे देश सुनना चाहेगा वह इकनामी को पटरी पर लाने वाला होगा या सत्ता की गाडी पटरी पर दौडती रहे इसके लिये इक्नामी को पटरी से उतार देगा । और वह भाषण कौन देगा ये अभी सस्पेंस है ? जेटली अगर न्यूयार्क से नहीं लौटते तो वित्त राज्य मंत्री शिवप्रताप शुक्ला या पी राधाकृष्णन में इतनी ताकत नहीं कि वह भाषण से सियासत साध लें । फिर सिर्फ भाषण के लिये पियूष गोयल वित्त मंत्री प्रभारी हो जायेगें ऐसा संभव नहीं है । तो क्या बजट प्रधानमंत्री मोदी ही रखेगें । ये सवाल तो है ?     

रविवार, 13 जनवरी 2019

आरक्षण के नाम पर बेवकूफ ना बनाये खाली पडे पदो पर नियुक्ति करें ....

आरक्षण के नाम पर बेवकूफ ना बनाये.....खाली पडे पदो पर नियुक्ति करें ....


रोजगार ना होने का संकट या बेरोजगारी की त्रासदी से जुझते देश का असल संकट ये भी है केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्वीकृत पदो पर भी नियुक्ति नहीं की हैं। एक जानकारी के मुताबिक करीब एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। जी ये सरकारी पद हैं। जो देश के अलग अलग विभागों से जुड़े हैं ।  1साल पहले ही जब राज्यसभा में सवाल उठा तो कैबिनेट राज्य मंत्री जितेन्द्र प्रसाद ने जवाब दिया। केन्द्र सरकार के कुल 4,20,547 पद खाली पड़े हैं। और महत्वपूर्ण ये भी है केन्द्र के जिन विभागो में पद खाली पड़े हैं, उनमें 55,000 पद सेना से जुड़े हैं। जिसमें करीब 10 हजार पद आफिसर्स कैटेगरी के हैं। इसी तरह सीबीआई में 22 फीसदी पद खाली हैं। तो प्रत्यर्पण विभाग यानी ईडी में 64 फीसदी पद खाली हैं। इतना ही नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सरीखे आम लोगो की जरुरतों से जुडे विभागों में 20 ले 50 फीसदी तक पद खाली हैं। तो क्या सरकार पद खाली इसलिये रखे हुये हैं कि काबिल लोग नहीं मिल रहे। या फिर वेतन देने की दिक्कत है । या फिर नियुक्ति का सिस्टम फेल है । हो जो भी लेकिन जब सवाल रोजगार ना होने का देश में उठ रहा है तो केन्द्र सरकार ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों के तहत आने वाले लाखों पद खाली पडे हैं। आलम ये है कि देश भर में 10 लाख प्राइमरी-अपर प्राइमरी स्कूल में टीचर के पद खाली पड़े हैं। 5,49,025 पद पुलिस विभाग में खाली पडे हैं। और जिस राज्य में कानून व्यवस्था सबसे चौपट है यानी यूपी। वहां पर आधे से ज्यादा पुलिस के पद खाली पड़े हैं। यूपी में 3,63,000 पुलिस के स्वीकृत पदो में से 1,82,000 पद खाली पड़े हैं। जाहिर है सरकारों के पास खाली पदो पर नियुक्ति करने का कोई सिस्टम ही नहीं है। इसीलिये मुश्किल इतनी भर नहीं कि देश में एजुकेशन के प्रीमियर इंस्टीट्यूशन तक में पद खाली पड़े हैं। मसलन 1,22,000 पद इंजीनियरिंग कालेजो में खाली पडे है। 6,000 पद आईआईटी, आईआईएम और एनआईटी में खाली पड़े हैं। 



6,000 पद देश के 47 सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में खाली पड़े हैं। यानी कितना ध्यान सरकारों को शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर हो सकता है, ये इससे भी समझा जा सकता है कि दुनिया में भारत अपनी तरह का अकेला देश है जहा स्कूल-कालेजों से लेकर अस्पतालो तक में स्वीकृत पद आधे से ज्यादा खाली पड़े है । आलम ये है कि 63,000 पद देश के 363 राज्य विश्वविघालय में खाली पडे हैं। 2 लाख से ज्यादा पद देश के 36 हजार सरकारी अस्पतालों में खाली पडे हैं। बुधवार को ही यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्दार्थ नाथ सिंह ने माना कि यूपी के सरकारी अस्पतालों में 7328 खाली पड़े पदो में से 2 हजार पदों पर जल्द भर्ती करेंगे। लेकिन खाली पदो से आगे की गंभीरता तो इस सच के साथ जुडी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि कम से कम एक हजार मरीज पर एक डाक्टर होना ही चाहिये । लेकिन भारत में 1560 मरीज पर एक डाक्टर है । इस लिहाज से 5 लाख डाक्टर तो देश में तुरंत चाहिये । लेकिन इस दिशा में सरकारे जाये तब तो बात ही अलग है । पहली प्रथमिकता तो यही है कि जो पद स्वीकृत है । इनको ही भर लिया जाये । अन्यथा समझना ये भी होगा कि स्वास्थय व कल्याण मंत्रालय का ही कहना है कि फिलहाल देश में 3500 मनोचिकित्सक हैं जबकि 11,500 मनोचिकित्सक और चाहिये 
और जब सेना के लिये जब सरकार देश में ही हथियार बनाने के लिये नीतियां बना रही है और विदेशी निवेश के लिये हथियार सेक्टर भी खोल रही है तो सच ये भी है कि आर्डिनेंस फैक्ट्री में 14 फीसदी टैक्निकल पद तो 44 फिसदी नॉन-टेक्नीकल पद खाली पडे हैं।




यानी सवाल ये नहीं है कि रोजगार पैदा होंगे कैसे । सवाल तो ये है कि जिन जगहो पर पहले से पद स्वीकृत हैं, सरकार उन्हीं पदों को भरने की स्थिति में क्यों नहीं है। ये हालात देश के लिये खतरे की घंटी इसलिये है क्योंकि एक तरफ खाली पदों को भरने की स्थिति में सरकार नहीं है तो दूसरी तरफ बेरोजगारी का आलम ये है कि यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट कहती है कि 2016 में भारत में 1 करोड 77 लाख बेरोजगार थे । जो 2017 में एक करोड 78 लाख हो चुके हैं और 2018 में 2 करोड 87 लाख पार कर गये। लेकिन भारत सरकार की सांख्यिकी मंत्रालय की ही रिपोर्ट को परखे तो देश में 15 से 29 बरस के युवाओ करी तादाद 33,33,65,000 है । और ओईसीडी यानी आरगनाइजेशन फार इक्नामिक को-ओपरेशन एंड डेवलेपंमेंट की रिपोरट कहती है कि इन युवा तादाद के तीस पिसदी ने तो किसी नौकरी को कर रहे है ना ही पढाई कर रहे है । यानी करीब देश के 10 करोड युवा मुफलिसी में है । जो हालात किसी भी देश के लिये विस्पोटक है । लेकिन जब शिक्षा के क्षेत्र में भी केन्द्र और राज्य सरकारे खाली पद को भर नहीं रही है तो समझना ये भी होगा कि देश में 18 से 23 बरस के युवाओं की तादाद 14 करोड से ज्यादा है । इसमें 3,42,11,000 छात्र कालेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। और ये सभी ये देख समझ रहे है कि दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी की कतार में भारतीय विश्वविधालय पिछड चुके है । रोजगार ना पाने के हालात ये है कि 80 फीसदी इंजीनियर और 90 फिसदी मैनेजमेंट ग्रेजुएट नौकरी लायक नही है । आईटी सेक्टर में रोजगार की मंदी के साथ आटोमेशन के बाद बेरोजगारी की स्थिति से छात्र डरे हुये हैं। यानी कहीं ना कहीं छात्रों के सामने ये संकेट तो है कि युवा भारत के सपने राजनीति की उसी चौखट पर दम तोड रहे है जो राजनीति भारत के युवा होने पर गर्व कर रही है । और एक करोड़ खाली सरकारी पदों को भरने का कोई सिस्टम या राजनीतिक जिम्मेदारी किसी सत्ता ने अपने ऊपर ली नहीं है।

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

संसद में तार तार होते संविधान की फिक्र किसे है....

संसद में तार तार होते संविधान की फिक्र किसे है....




मोदी सत्ता के दस फिसदी आरक्षण ने दसियो सवाल खडे कर दिये । कुछ को दिखायी दे रहा है कि बीजेपी-संघ का पिछडी जातियो के खिलाफ अगडी जातियो के गोलबंदी का तरीका है । तो कुछ मान रहे है कि  जातिय आरक्षण के पक्ष में तो कभी बीजेपी रही ही नहीं तो संघ की पाठशाला जो हमेशा से आर्थिक तौर पर कमजोर तबके को आरक्षण देने के पक्ष में थी उसका श्रीगणेश हो गया । तो किसी को लग रहा है कि तीन राज्यो के चुनाव में बीजेपी के दलित प्रेम से जो अगडे रुठ गये थे उन्हे मनाने के लिये आरक्षण का पांसा फेंक दिया गया । तो किसी को लग रहा है आंबेडकर की थ्योरी को ही बीजेपी ने पलट दिया ।  जो आरक्षण के व्यवस्था इस सोच के साथ कर गये थे कि हाशिये पर पडे कमजोर तबके को मुख्यधारा से जोडने के लिये आरक्षण जरुरी है । तो कोई मान रहा है कि शुद्द राजनीतिक लाभ का पांसा बीजेपी ने अगडो के आरक्षण के जरीये फेंका है । तो किसी को लग रहा है बीजेपी को अपने ही आरक्षण पांसे से ना खुदा मिलेगा ना विलासे सनम । 



और कोई मान रहा है कि बीजेपी का बंटाधार तय है क्योकि आरक्षण जब सीधे सीधे नौकरी से जोड दिया गया है तो फिर नौकरी के लिये बंद रास्तो को बीजेपी कैसे खोलेगी । यानी युवा आक्रोष में आरक्षण घी का काम करेगा । और कोई तो इतिहास के पन्नो को पलट कर साफ कह रहा है जब वीपी सिंह को मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने वाले हालात में भी सत्ता नहीं मिली तो ओबीसी मोदी की हथेली पर क्या रेगेंगा । इन तमाम लकीरो के सामानांतर नौकरी से ज्यादा राजनीतिक सत्ता के लिये कैसे आरक्षण लाया जा रहा है और बिछी बिसात पर कैसी कैसी चाले चली जा रही है ये भी कम दिलचस्प नहीं है । क्योकि आरक्षण का समर्थन करती काग्रेस के पक्ष में जो दो दल खुल कर साथ है उनकी पहचान ही जातिय आरक्षण से जुडी रही है पर उन्ही दो दल [ आरजेडी और डीएमके  ]  ने मोदी सत्ता के आरक्षण का विरोध किया । फिर जिस तरह आठवले और पासवान मोदी के गुणगान में मायावती को याद करते रहे और मायावती मोदी सत्ता के खिलाफ लकीरो को गढा करती रही उसने अभी से संकेत देने शुरु कर दिये है कि इस बार का लोकसभा चुनाव वोटरो को भरमाने के लिये ऐसी बिसात बिछाने पर उतारु है जिसमें पार्टियो के भीतर उम्मीदवार दर उम्मीदवार का रुख अलग अलग होगा ।



तो क्या देश का सच आरक्षण में छिपे नौकरियो के लाभ का है । पर सवाल तो इसपर भी उठ चुके है । क्योकि एक तरफ नौकरिया हैा नहीं और दूसरी तरफ मोदी सत्ता के आरक्षण ने अगडे तबके में भी दरार कुछ ऐसी डाल दी कि जिसने दस फिसदी आरक्षण का लाभ उठाया वह भविष्य में फंस जायेगा । क्योकि 10 फिसदी आरक्षण के दाय.रे में आने का मतलब है सामन्य कोटे के 40 फिसदी से अलग हो जाना । तो 10 फिसदी आरक्षण का लाभ भविष्य में दस फिसदी के दायरे  में ही सिमटा देगा । पर मोदी सत्ता के आरक्षण के फार्मूले ने पहली बार देश के उस सच को भी उजागर कर दिया है जिसे अक्सर सत्ता छुपा लेती थी । यानी देश में जो रोजगार है उसे भी क्यो भर पाने की स्थिति में कोई भी सत्ता क्यो नहीं आ पाती है ये सवाल इससे पहले गवर्नेस की काबिलियत पर सवाल उठाती थी । लेकिन इस बार आरक्षण कैसे एक खुला सियासी छल है ये भी खुले तौर पर ही उभरा है । यानी सवाल सिर्फ इतना भर नहीं है कि देश की कमजोर होती अर्थवयवस्था या विकास दर के बीच नौकरिया पैदा कहा से होगी । बल्कि नया सवाल तो भी है कि सरकार के खजाने में इतनी पूंजी ही नहीं है कि वह खाली पडे पदो को भर कर उन्हे वेटन तक देने की स्थिति में आ जाय़े । यूं ये अलग मसला है कि सत्ता उसी खजाने से अपनी विलासिता में कोई कसर छोडती नहीं है ।
तो ऐसे में आखरी सवाल उन युवाओ का है जो पाई पाई जोड कर सरकारी नौकरियो के फार्म भरने और लिखित परिक्षा दे रहे है । और इसके बाद भी वही सुवा भारत गुस्से में हो जिस युवा भारत को अपना वोटर बनाने के लिये वही सत्ता लालालियत है जो पूरे सिस्टम को हडप कर आरक्षण को ही सिस्टम बनाने तक के हालात बनाने की दिसा में बढ चुकी है । यानी जिन्दगी जीने की जद्दोजहद में राजनीतिक सत्ता से करीब आये बगैर कोई काम हो नहीं सकता । और राजनीतिक सत्ता खुद को सत्ता में बनाये रखने के लिये बेरोजगार युवाओ को राजनीतिक कार्यकर्ता बनाकर रोजगार देने से नहीं हिचक रही है । बीजेपी के दस करोड कार्यकत्ताओ की फौज में चार करोड युवा है । जिसके लिये राजनीतिक दल से जुडना ही रोजगार है । राजनीतिक सत्ता की दौड में लगे देश भर में हजारो नेताओ के साथ देश के सैकडो पढे-लिखे नौजवान इसलिये जुड चुके है क्योकि नेताओ की प्रोफाइल वह शानदार तरीके से बना सकते है । और नेता को उसके क्षेत्र से रुबरु कराकर नेता को कहा क्या कहना है इसे भी पढे लिखे युवा बताते है , और सोशल मीडिया पर नेता के लिये शब्दो को न्यौछावर यही पढे लिके नौजवान करते है । क्योकि नौकरी तो सत्ता ने अपनी विलासिता तले हडप लिया और सत्ता की विलासिता बरकरार रहे इसके लिये पढे लिखे बेरोजगारो ने इन्ही नेताओ के दरवाजे पर नौकरी कर ली । शर्मिदा होने की जरुरत किसी को नहीं है क्योकि बीते चार बरस में दिल्ली में सात सौ से ज्यादा पत्रकार भी किसी नेता , किसी सांसद , किसी विधायक , किसी मंत्री या फिर पीएमओ में ही बेरोजगारी के डर तले उन्ही की तिमारदारी करने को ही नौकरी मान चुके है । यानी सवाल ये नहीं है कि आरक्षण का एलान किया ही क्यो गया जब कुछ लाभ नहीं है बल्कि सवाल तो अब ये है कि वह कौन सा बडा एलान आने वाले दो महीने में होने वाला है जो भारत का तकदीर बदलने के लिये होगा । और उससे डूबती सत्ता संभल जायेगी । क्या ये संभव है । अगर है तो इंतजार किजिये और अगर संभव नहीं है तो फिर सत्ता को संविधान मान लिजिये जिसका हर शब्द अब संसद में ही तार तार होता है ।   

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

स्वयंसेवक की चाय का तूफान :.....तो क्या फरवरी में बीजेपी के भीतर खुली बगावत हो जायेगी ?

स्वयंसेवक की चाय का तूफान :.....तो क्या फरवरी में बीजेपी के भीतर खुली बगावत हो जायेगी ?


ना ना फरवरी में टूटेगी नहीं लेकिन बिखर जायेगी । बिखर जायेगी से मतलब....मतलब यही कि कोई कल तक जो कहता था वह पत्थर की लकीर मान ली जाती थी । पर अब वही जो कहता है उसे कागज पर खिंची गई लकीर के तौर पर भी कोई मान नहीं रहा है । तो होगा क्या ? कुछ नहीं कहने वाला कहता रहेगा क्योकि कहना उसकी ताकत है । और खारिज करने वाला भविष्य के ताने बाने को बुनना शुरु करेगा । जिसमें कहने वाला कोई मायने रखेगा ही नहीं । तब तो सिरफुटव्वल शुरु हो जायेगा । टकराव कह सकते है । और इसे रोकेगा कौन सा बडा निर्णय ये सबसे बडे नेता पर ही जा टिका है ।


स्वयंसेवक महोदय की ऐसी टिप्पणी गले से नीचे उतर नहीं रही थी क्योकि भविष्य की बीजेपी और 2019 के चुनाव की तरफ बढते कदम के मद्देनजर मोदी सत्ता के एक के बाद एक निर्णय को लेकर बात शुरु हुई थी । दिल्ली में बारिश के बीच बढी ठंड के एहसास में गर्माती राजनीति का सुकुन पाने के लिये स्वयसेवक महोदय के घर पर जुटान हुआ था । प्रोफेसर साहेब तो जिस तरह एलान कर चुके थे कि मोदी अब इतनी गलतियां करेगें कि बीजेपी के भीतर से ही उफान फरवरी में शुरु हो जायेगा । पर उसपर मलहम लगाते स्वयसेवक महोदय पहली बार किसी मंझे हुये राजनीतिज्ञ की तर्ज पर समझा रहे थे कि भारत की राजनीति को किसी ने समझा ही नहीं है । आपको लग सकता है कि 2014 में काग्रेस ने खुद ही सत्ता मोदी के हाथो में सौप दी । क्योकि एक के बाद दूसरी गलती कैसे 2012-13 में काग्रेस कर रही थी इसके लिये इतिहास के पन्नो को पलटने की जरुरत नहीं है । सिर्फ दिमाग पर जोर डाल कर सबकुछ याद कर लेना है । और अब ..मेरे ये कहते ही स्वयसेवक महोदय किसी इमानदार व्यापारी की तरह बोल पडे ...अभी क्या । हमलोग तो कोई कर्ज रखते नहीं है । तो मोदी खुद ही काग्रेस को सत्ता देने पर उतारु है । यानी प्रोफेसर साहेब गलत नहीं कह रहे है कि मोदी अभी और गलती करेगें । जी, ठीक कहा आपने । लेकिन इसमें थोडाी सुधार करना होगा । क्योकि मोदी की साख जो 2017 तक थी , उस दौर में यही बाते इसी तरह कही जाती तो आप इसे गलती नहीं मानते ।
अब प्रोफेसर साहेब ही बोल पडे ...मतलब ।



मतलब यही कि 2014 से 2017 का काल भारत के इतिहास में मोदी काल के तौर पर जाना जायेगा । पर उसके बाद 2018-19 संक्रमण काल है । जहा मोदी है ही नहीं । बल्कि मोदी विरोध के बोल और निर्णय थिसीस के उलट एंटी थीसीस रख रहे है । और ये तो होता ही या होना ही है ।
तब तो बीजेपी के भीतर भी एंटी थीसीस की थ्योरी होगी । वाह वाजपेयी जी । आपने नब्ज पर अंगुली  रख दी । मेरे कहने से स्वयसेवक महोदय जिस तरह उचक कर बोले उसमें चाय की चुस्की या उसकी गर्माहट तो दूर , पहली बार मैने तमाम चर्चाओ के दौर में महसूस किया कि डूबते जहाज में अब संघ भी सवार होने से कतरा रहा है । क्योकि जिस तरह का जवाब स्वयसेवक महोदय ने इसके बाद दिया वह खतरे की घंटी से ज्यादा आस्तितव के संघर्ष का प्रतिक था ।
आपको क्या लगता है राजनाथ सिंह संकल्प पत्र तैयार करेगें । या फिर गडकरी सामाजिक संगठनो को जोडने के लिये निकलेगें । या जिन भी जमीनी नेताओ को 2019 के चुनाव के मद्देनजर जो काम सौपा गया है वह उस काम में जुट जायेगें । या फिर ये नेता खुश होगें कि उन्हे पूछा गया कि आप फंला फंला काम कर लें । मान्यवर इसे हर कोई समझ रहा है कि लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी का भविष्य कैसा है । और 2014 में जब जीत पक्की थी जब संकल्प पत्र किसने तैयार किया था । बेहद मशक्कत से तैयार किया गया था । पर संकल्प पत्र पर अमल तो दूर संकल्प पत्र तैयार करने वाले हो ही दरकिनार कर दिया गया ।



 किसकी बात कर रहे है आप....अरे प्रोफेसर साहेब मुरली मनोहर जोशी जी की ।  और उस संकल्प पत्र में क्या कुछ नही था । किसान हो या गंगा । आर्थिक नीतिया हो या वैदेशिक नीतिया । बकायदा शोध करने सरीखे तरीके से बीजेपी सत्ता की राह को जोशी जी ने मेहनत से बनाया । पर हुआ क्या । मोदी जी ने जितनी लकीरे खिंची । जितने निर्णय लिये उसका रिजल्ट क्या निकला । राजनीतिक तौर पर समझना चाहते है तो तमाम सहयोगियो को परख लिजिये । हर कोई मोदी-शाह  का साथ छोडना चाहता है । बिहार - यूपी में  कुल सीट 120 है । और यहा के हालात बीजेपी के लिये ऐेसे बन रहे है कि अपने बूते 20 सीट भी जीत नहीं पायेगी । जातिय आधार पर टिकी राजनीति को सोशल इंजिनियरिंग कहने से क्या होगा । कोई वैकल्पिक समझ तो दूर उल्टे पारंपरिक वोट बैक जो बीजेपी के साथ रहा पहली बार मोदी काल में उसपर भी ग्रहण लग रहा है । तो बीजेपी में ही कल तक के तमाम कद्दावर नेता अब क्या करेगं । क्या कोई कल्पना कर सकता है कि राफेल का सवाल आने पर प्रधानमंत्री इंटरव्यू में कहते है कि , पहली बात तो ये उनपर कोई आरोप लगी है । दूसरा ये निर्णय सरकार का था ।यानी वह संकेत दे रहे है कि दोषी रक्षा मंत्री हो सकते है । वह नहीं । और इस आवाज को सुन कर पूर्व रक्षा मंत्री पार्रिकर संकेत देते है कि राफेल फाइल तो उनके कमरे में पडी है । जिसमें निर्णय तो खुद प्रधानमंत्री का है । फिर इसी तरह सवर्णो को दस फिसदी आरक्षण देने के एलान के तुरंत बाद नितिन गडकरी ये कहने से नहीं चूकते कि इससे क्या होगा । यानी ये तो बुलबुले है । लेकिन कल्पना किजिये फरवरी तक आते आते जब टिकट किसे दिया जायेगा और कौन से मुद्दे पर किस तरह चुनाव लडा जायेगा तब ये सोचने वाले मोदी-शाह के साथ कौन सा बीजेपी का जमीनी नेता खडा होगा । और खडा होना तो दूर बीजेपी के भीतर से क्या वाकई कोई आवाज नहीं आयेगी ।
आप गलतियो का जिक्र कर रहे थे....मेरे ये पूछते ही स्वयसेवक महोदय कुर्सी से खडे हो गये . बकायदा चाय की प्याली हाथ में लेकर खडे हुये और एक ही सांस में बोलने लगे....अब आप ही बताइये आरक्षण के खिलाफ रहनी वाली बीजेपी ने सर्वर्णो को राहत देने के बदले बांट दिया । बारिकी से परखा आपने सर्वोणो में जो गरीब होगा उसके माप दंड क्या क्या है । यानी जमीन से लेकर कमाई के जो मापदंड शहर और गांव के लिये तय किये गये है उसमें झूठ फरेब घूस सबकपछ चलेगा । क्योकि 8 लाख से कम सालाना कमाई । 5 एकड से कम कृर्षि जमीन । एक हजार स्कावयर फीट से कम की जमीन पर घर और म्यूनिस्पलटी इलाके में सौ यार्ड से कम का रिहाइशी प्लाट होने पर ही आरक्षण मिलेगा । और भारत में आरक्षण का मतलब नौकरी होती है । जो है नहीं ये तो देश का सच है । लेकिन कल्पना किजिये जब पटेल से लेकर मराठा और गुर्जर से लेकर जाट तक देश भर में नौकरी के लिये आरक्षण की गुहार लगा रहा है तो आपने कितनो को नाराज किया या कितनो को लालीपाप दिया । असल में अभी तो मोदी-शाह की हालत ये है कि जो चाटुकार दरबारी कह दें और इस आस से कह दे कि इससे जीत मिल जायेगी ...बस वह निर्णय लेने में देर नहीं होगी । पर बंटाधार तो इसी से हो जायेगा ।



तो रास्ता क्या है । अब प्रोफेसर साहेब बोले ......और ये सुन कर वापस कुर्सी पर बैठते हुये स्वयसेवक महोदय बोल पडे रास्ता सत्ता का नहीं बल्कि सत्ता गंवाने का ठिकरा सिर पर ना फुटे इस रास्ते को बनाने के चक्कर में समूचा खेल हो रहा है ।
तो क्या अखिलेश के बाद अब मायावती पर भी सीबीआई डोरे डालेगी ।
नही प्रोफेसर साहेब ये गलती तो कोई नहीं करेगा । लेकिन आपने अच्छा किया जो मायावती का जिक्र कर दिया । क्योकि राजनीति की समझ वही से पैदा भी होगी और डूबेगी भी । क्यों ऐसा क्यो ....मेरे सवाल करते ही स्वयसेवक महोदय बोल पडे...वाजपेयी जी समझिये ...मायावती दो नाव की सवारी कर रही है । और मायावती को लेकर हर कोई दो नाव पर सवार है । पर घाटा मायावती को ही होने वाला है ।
वह कैसे...
प्रोफेसर साहेब जरा समझे .मायावती चुनाव के बाद किसी के भी साथ जा सकती है । काग्रेस के साथ भी और बीजेपी के साथ भी । और ये दोनो भी जानते है कि मायावती उनके साथ आ सकती है । और मायावती ये भी जानती है कि अखिलेश यादव के साथ चुनाव से पहले गठबंधन करना उसकी मजबूरी है या कहे दोनो की मजबूरी है । क्योकि दोनो ही अपनी सीट बढाना चाहते है । पर अखिलेश और मायावती दोनो समझते है कि राज्य के चुनाव में दोनो साथ रहेगें तो सीएम का पद किसे मिलेगा लडाई इसी को लेकर शुरु होगी तो वोट ट्रांसफर तब नहीं होगें । लेकिन लोकसभा चुनाव में वोट ट्रासफर होगें । क्योकि इससे चुनाव परिणामो के बाद सत्ता में आने की ताकत बढेगी । पर मायावती के सामने मुश्किल यह है कि जब चुनाव के बाद मायावती कही भी जा सकती है तो उसके अपने वोटबैक में ये उलझन होगी कि वह मायावती को वोट किसके खिलाफ दे रही है । और जिस तरह मुस्लिम-दलित ने बीजेपी से दूरी बनायी है । और अब आरक्षण के सवाल ने टकराव के नये संकेत भी दे दिये है तो फिर मायावती का अखिलेश को फोन कर सीबीआई से ना घबराने की बात कहना अपने स्टेंड का साफ करने के लिये उठाया गया कदम है । पर सत्ता से सौदेबाजी में अभी सबसे कमजोर मायावती के सामने मुश्किल ये भी है कि काग्रेस का विरोध उसे मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तिसगढ में  और कमजोर कर देगा ।
चाय खत्म करने से पहले एक सवाल का जवाब तो आप ही दे सकते है ....जैसे ही प्रोफेसर साहेब ने स्वयसेवक से कहा ...वह क्या है ....संघ क्या सोच रहा है ।
हा हा हा ...ठहाका लगाते हुये स्वयसेवक महोदय बोल पडे । संघ सोच नहीं रहा देख रहा है ।
तो क्या संघ कुछ बोलेगा भी नहीं ....
संघ बोलता नहीं बुलवाता है । और कौन बोल रहा है और आने वाले वक्त में कौन कौन बोलेगा....इंतजार किजिये फरवरी तक बहुत कुछ होगा । 

सोमवार, 7 जनवरी 2019

खनन लूट में जांच हो तो हर सीएम जेल में होगा .....

खनन लूट में जांच हो तो हर सीएम जेल में होगा .....


राजनीति साधने वाले मान रहे है और कह रहे है कि अखिलेश यादव पर सीबीआई शिकंजा सपा-बसपा गंठबंधन की देन है । यानी गठंबधन मोदी सत्ता की खिलाफ है तो मोदी सत्ता ने सीबीआई का फंदा अखिलेश यादव के गले में डाल दिया । और राजनीति साधने वाले ये भी कह रहे है कि आखिर खनन की लूट में सीएम कैसे शामिल हो सकता है । जो अखिलेश पर सीबीआई जांच के खिलाफ है वह साफ कह रहे है कि दस्तावेजो पर तो नौकरशाहो के हस्तख्त होते है । लूट खनन माफिया करते है तो सीएम बीच में कहां से आ गये । 



तो सीबीआई जांच के हक में खडे राजनीति साधने वाले ये कहने से नहीं चूक रहे है कि सीएम ही तो राज्य का मुखिया होता है तो खनन लूट उसकी जानकारी के बगैर कैसे हो सकती है । चाहे अनचाहे सीबीआई जांच के हक में खडे बीजेपी के नेता-मंत्री की बातो को सही मानना चाहिये । और विपक्ष को तो इसे ठहरा कर बीजेपी से भी कही ज्यादा जोर से कहना चाहिये कि किसी भी राज्य में खनन की लूट हो रही होगी तो तात्कालिन सीएम को गुनहगार मानना ही चाहिये । और इस कडी में और कोई नहीं बल्कि मोदी सत्ता में ही खनन मंत्रालय की फाइलो को खोल देना चाहिये । और उसके बाद राज्य दर राज्य खनन लूट के आंकडो के आसरे हर राज्य के मुख्यमंत्री के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग शुरु कर देनी चाहिये । 



इसके लिये बहुत विपक्ष को बहुत मेहनत करने की भी जरुरत नहीं है । क्योकि मोदी सत्ता के दौर में भी राज्यो में खनन लूट के जरीये राजस्व को लगते चूने को परखे तो गुजरात के सीएम विजय रुपानी तो जेल पहुंच जायेगें और चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हुये मद्यप्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के खिलाफ भी सीबीआई जांच के आदेश आज नहीं तो कल शुरु हो ही जायेगें । क्योकि जिस दौर में यूपी में खनन की ळूट हो रही थी उसी दौर में मद्यप्रदेश , राजस्थान और गुजरात में सबसे ज्यादा खनन की लूट हुई । 2013-14 से लेकर 2016-17 के दौर में यूपी में जितनी खनन की लूट हुई या राजस्व का जितना चूना लगाया गया । या फिर जितने मामले खनन लूट के एफआईआर के तौर पर दर्ज किये गये उस तुलना में उसी दौर में मद्यप्रदेश ने तो देश का ही रिकार्ड तोड दिया । क्योकि 2013-14 में गैरकानूनी खनन के 6725 मामले मद्यप्रदेश में दर्ज किये गये थे । जो 2016-17 में बढकर 13,880 मामलो तक पहुंच गये । यानी चार बरस के दौर में खनन लूट के मामलो में सिर्फ मद्यप्रदेश में 52.8 फिसदी की बढतरी हो गई । इसी कडी में गुजरात के सीएम के तौर पर जब मोदी 2013-14 में थे तब 5447 अवैध या कहे गैर कानूनी खनन के मामले दर्ज किये गया । और मोदी दिल्ली में पीएम बने तो रुपानी गुजरात के सीएम बने और गैर कानूनी खननके जरीये राज्सव की लूट बढ गई । 2016-17 में गुजरात में अवैध खनन की लूट के 8325 मामले दर्ज किये गये । यानी यूपी में अकिलेश की नाक के नीचे अवैध खनन जारी था तो सीबीआई जांच करेगी तो फिर शिवराज सिंह चौहान हो या रुपानी उनके नाक भी तो सीएम वाली ही थी तो उनके खिलाफ भी सीबीआई जांच की शुरउात का इंतजार करना चाहिये ।

वैसे देश में खनन की लूट ही राजनीति को आक्सीजन देती है या कहे खनन लूट के जरीये राजनीति कैसे साधी जाती है ये बेल्लारी में खनन लूट से लेकर गोवा में खनन लूट पर जांच कमीशन की रिपोर्ट से भी सामने आ चुका है । लेकिन धीरे धीरे खनन लूट को सत्ता की ताकत के तौर पर मान्यता दे दी गई । और खनन लूट को सियासी हक मान लिया गया । तभी तो राज्यवार अगर खनन लूट के मामलो को परखे और परखने के लिये मोदी सत्ता की ही फाइलो को टटोले तो कौन सा राज्य या कौन से राज्य का कौन सा सीएम सीबीआई जांच से बचेगा ये भी अपने आप में देश का नायाब सच है । क्योकि राजस्थान में वसुंधरा राज में 2013-14 में खनन लूट के 2953 मामले दर्ज हुये तो 2016-17 में ये बढकर 3945 हो गये । पर खनन लूट का सच इतना भर नहीं है कि एफआईआर दर्ज हुई । बल्कि लूट करने वालो से फाइन वसूल कर सीएम अपनी छाती भी ठोकतें है कि उन्होने इमानदारी से काम किया और जो अवैध लूट कर रहे थे उनसे वसली कर ली । पर इसके एवज में कौन कितना हडप ले गया इसपर सत्ता हमेशा चुप्पी साध लेता है । मसलन मद्यप्रदेश जहा सूसे ज्यादा खनन लूटे के मामले दर्ज हुये वहा राज्य सरकार ने अपनी सफलता 1132.06 करोड रुपये वसूली की तहत दिखाये । लेकिन इसकी एवज में खनन लूट से राज्य को एक लाख करोड से ज्यादा का नुकसान हो गया इसपर किसी ने कुछ कहा ही नहीं । इसी तरह बीजेपी शासित दूसरे राज्यो का हाल है । क्योकि महाराष्ट्र सरकार ने 281.78 करोड की वसूली अवैध खनन करने वालो से दिखला दी । लेकिन इससे सौ गुना ज्यादा राजस्व के घाटे को बताने में कोताही बरती । गुजरात में भी 156.67 करोड रुपये की वसूली अवैध खनन करने वालो से हुई इसे बताया गया । पर राज्सव की लूट जो एक हजार करोड से ज्यादा की हो गई । इ पर खामोशी बरती गई । यही हाल छत्तिसगढ का है जहा अवैध वसूली के नाम पर 33.38 करोड की वसूली दिखायी गई लेकिन इससे एक हजा गुना ज्यादा के राजस्व की लूट पर खामोशी बरती गई । पर ये खेल सिर्फ बीजेपी शासित राज्यो भर का नहीं है बल्कि कर्नाटक जहा काग्रेस की सरकार रही वहा पर भी 111.63 करोड की वसूली अवैध खनन से हुई इसे दिखलाया गया । लेकिन 60 हजार करोड के राजस्व लूट को बताया ही नहीं गया । काग्रे बीजेपी ही क्यो आध्रप्रदेश में भी क्षत्रप की नाक तले 143.23 करोड की वसली दिखाकर ये कहा गया कि अवैध खनन वालो पर शिकंजा कसा गया है लेकिन इसकी एवज में जो 50 हजार करोड के राजस्व का नुकसान कहां गया या कौन हडप ले गया इसपर किसी ने कुछ कहा ही नहीं । और इस खेल में इंडियन ब्यूरो आफ माइन्स की ही रिपोर्ट कहती है कि खनन लूट का खेल एक राज्य से दुसरे राज्य को मदद मिलती है । तो दूसरी राज्य से तीसरे राज्य को । क्योकि खनन कर अवैध तरीके से राजय की सीमा पार करने और दूसरे राज्य की सीमा में प्रवेश के लिये बकायदा ट्राजिट पास दे दिया जाते है । और जिस तरीके से देश में खनन की लूट बीस राज्यो में जारी है अगर उस खनन की कितम अंतर्ष्ट्रीय बाजार की किमत से लगायी जाये तो औसतन हर बरस बीस लाख करोड से ज्यादा का चूना खनन माफिया देश को लगाते है ।

तो वाकई अच्छी बात है कि खनन की लूट के लिये मुख्यमंत्री को भी कटघरे में खडा किया जा रहा है । तो मनाईये अखिलेश यादव के खिलाफ सीबीआई जांच हर राज्य के सीएम के खिलाफ सीबीआई जांच का रास्ता बना दें । और सिर्फ नौकरशाह को ही कटघरे में खडा ना किया जाये । और ये हो गया तो फिर सीएम की कतार कहां थमेगी कोई नहीं जानता और जो बात प्रधानमंत्री ने बरस के पहले दिन इंटरव्यू में ये कहकर  अपनी कमीज को साफ बतायी कि राफेल का दाग उनपर नहीं सरकार पर है तो जैसे सीएम की नाक वैसे ही पीएम की नाक । बचेगा कौन । पर देश का संकट तो ये भी है कि सीबीआई भी दागदार है । यानी लूट खनन भर की नहीं बल्कि सत्ता के नाम पर लोकतंत्र की ही लूट है । जिसकी जांच जनता को करनी है । 

रविवार, 6 जनवरी 2019

साहेब कभी एंकात में बैठ कर सोचियेगा आपने कितना वक्त बर्बाद किया....


95 मिनट का इंटरव्यू । प्रधानमंत्री का इंटरव्यू । नये साल के पहले दिन का इंटरव्यू । और  टेलीविजन स्क्रिन पर इंटरव्यू की उम्र महज दो घंटे रही तो अखबार के पन्ने पर इंटरव्यू चार कालम की जगह लेकर भी खबर ना बन सकी । 

तो क्या ये इंटरव्यू लेने वाले की पत्रकारिय सक्षमता पर सवालिया निशान है या फिर प्रधानमंत्री की समझ या समझाने की सोच का खोखलापन है । जहा सवाल कोई से भी हो लेकिन हर सवाल पर सफाई के साथ अपनी सफलता दिखाने बताने की चाह इस तरह लबालब हो कि मन की बात हर मन में क्यो नहीं समा रही है इसमें ही 95 मिनट जायर कर दिये जाये । तो हालात जब प्रधानमंत्री जैसे पद से इस तरह बताये जा रहे हो जैसे सुनने वालो का दायरा प्रधानमंत्री के सफलता को इसलिये समझ नहीं पा रही है क्योकि कोई समझाने वाला नहीं है । औरआखिर में खुद प्रधानमंत्री को ही फैसला लेना पडा कि उनके दिल की बैचेनी , उनकी सफलता की अनकही कहानिया , उनके लोकप्रिय होने की उडान को वह वक्त के ढलान पर फिर से गढ दें तो दोष किसी का होगा नहीं । बल्कि दोष तो देश के बहुंसख्य नागरिको का होगा जो प्रधानमंत्री पद पर बैठे शख्स की तरफ टकटकी लगाये खुद को सफल होते देखना चाहता है और प्रधानमंत्री खुद को सफल बताकर बार बार देश को सफल करार देने से नहीं चूक रहे है । बहस की गुजाइंश होनी नहीं चाहे कि जो शख्स इंटरव्यू ले रहा था वह कमजोर था । डरा हुआ था । भक्ति रस में समाया हुआ था । देश के संकट को समझते हुये भी बेहद नरम क्यो था । दरअसल इंटरव्यू लेने वाले पर राहुल गांधी की टिप्पणी और उसके बाद राहुल गांधी की टिप्पणी पर एडिटर गिल्ड का बयान । और उसके बाद पत्रकारो की बंटना । पुराने टिका-टिप्पणी को लेकर सवाल जवाब करना । ये सारे हालात बहुत साफ लकीर खिंचते है कि देश मोदीमय हो चुका है । यानी देश के पास संस्थान नहीं बच रहे है । स्कालर बेमहत्व के हो चले है । शिक्षा या रिसर्च बेमानी हो चला है । लोकतंत्र का समूचा अर्थ ही राजनीतिक सत्ता की दौड में सिमट चुका है । और जो सार्वजनिक मंचो से सबसे ज्यादा हंगामा करेगा वह सबसे असरकारक होगा । इसलिये चरखा कातते प्रधानमंत्री खुद को महात्मा गांधी मानेगें । सरदार पटेल की प्रतिमा के नीचे चिंतन की मुद्दो में खडे होकर खुद में नेहरु की छवि को देखेगें । नेहरु को खानदान शब्द के जरीये चिढा कर खुद को लोकतंत्र का सबसे बडा प्रहरी बतायेगें । और चर्चा देश में इसी पर कराने में भी सफल हो जायेगें कि महात्मा गांधी काग्रेस के खिलाफ थे । पटेल-नेहरु में छत्तीस का आंकडा था । आंबेडकर और गांधी का नजरिया संघ को मान्यता देता था । ध्यान दिजिये तो अतित के सवाल और अतित के हिन्दुस्तान की पहचान को लेकर जो भी गलत पाठ बार बार सत्ता के जरीये दोहराया  जा रहा है उसे लेकर विपक्ष का डर ये है कि जनता कही इसे सच ना मान लें । यानी भविष्य की पीढियां जिसके कंघे पर हिन्दुस्तान को सवार होना है उसे कौन सा पाठ पढना है , पढे हुये किस पाठ से हिन्दुस्तान को संवराना है सारे हालात उस राजनीति पर निर्भर किये जा रहे जो खुद अज्ञान के समंदर में गोते लगाकर भ्रष्ट्रचार और अपराध का तमगा लगाकर खुद को सफल माने हुये है ।

मुश्किल ये नहीं है कि 95 मिनट के इंटरव्यू में एक भी बात ऐसी नहीं कही गई जिसे गैर राजनीतिक हो । परेशानी ये भी नहीं है कि इंटरव्यू साफ झलका रहा था कि इंटरव्यू लेना वाला इसलिये खुश था कि सामने प्रधानमंत्री बैठे है और उन्होने उसे चुना कि आप सामने बैठेगें । मुसिबत ये भी नहीं थी प्रधानमंत्री जान चुके है कि लोकतंत्र की गर्दन जब उनकी मुठ्ठी में है तो चौथा स्तम्भ 95 मिनट उनकी सुनेगा ही ....सुनायेगा ही । विलाप करेगा ही । पर ये प्रधानमंत्री को कहने बताने वाला कोई नहीं था कि ऐसे 95 मिनट के इंटरव्यू आपके 56 इंच के सीने को लगातार छोटा कर रहे है । और आने वाले 100 दिनो में ये सीना गायब भी हो सकता है । जाहिर है यहा बहस हो सकती है कि जब प्रधानमंत्री सच सुनना ही नहीं चाहते तो 95 मिनट क्या 95 हजार मिनट तक उनके सामने बैठने में क्या दिक्कत है । या फिर प्रधानमंत्री को सच बताने वाले अगर यही बता रहे है कि आप तो जनता के दिल में बसे हुये हो । एक वक्त  "मौत के सौदागर  " कहने पर जनता के जवाब दे दिया । तो एक वक्त " नीच" कहने पर जवाब दे दिया । एक वक्त  " चायवाला  " कहने पर जनता ने जवाब दे दिया । तो अब " चोर  " कहने वालो को भी जवाब मिल जायेगा । बस आप घबराइये नहीं । जाहिर है ये उडान है । सत्ता की ऐसी उडान जिसमें सत्ता कमरे में बंद है और जनता खुले आसमान तले उडते परिंदो के पर कतरने को तैयार है । लेकिन उडान तो उडान है । उसलिये लोकतंत्र की गर्दन पर मरोडते हुये भी इंटरव्यू में बंगाल का जिक्र आने पर वहा लोकतंत्र खत्म करने के आरोप ममता पर लगाये तो जा सकते है कि उन्होने रथयात्रा निकलने ना दी । लेकिन ये अंदाज कैसे जनता को अच्छा लगेगा । जब लोकतंत्र के खत्मे का सवाल कोई पीएम किसी सीएम पर ऐसे वक्त लगा रहा हो जब देश में बहस गर्म हो कि लोकतंत्र गायब क्यो हो चला है । दरअसल जो मोदी को हिटलर कहते है या समझते है , वह भूल करते है । और जो मोदी को राजनीति की नब्ज पर अंगुली रखने वाला मानते है वह भी गलती करते है । हिटलर ने कभी अपने से ज्यादा ताकतवर को हिटलर नहीं कहा या फिर हिटलक की लकीर पर चलने वालो को हिटलर ने ही सबसे पहले खत्म कर दिया । तो ममता को अलोकतांत्रिक बताना अलोकतांत्रिक मोदी की भूल है ।दूसरा , 2014 में मां गंगा का जिक्र कर ही जो शख्स चुनाव मैदान में कूदता है उसे ये भी जानकारी नहीं है कि मां गंगा में सबसे ज्यादा कूडा बंगाल में ही गिरता है । यानी अपनी राजनीतिक जमीन की पहचान के बदले ममता की राजनीतिक जमीन के अखाडे में खडा होकर ममता से मोदी कैसे लड सकते है ये बताने वाला तक कोी नहीं  । मोदी सरकार के ही आंकडे बताते है कि उत्तरप्रदेश में अगर हर दिन 3275 टन कूडा गंगा में गिरता है तो बंगाल में 6132 टन कूडा गंगा में गिरता है । यानी उत्तराखंड, यूपी , बिहार, झारखंड  में मिलाकर हर दिन 5597 टन कूडा-कचरा  गंगा में गिरता है तो अकेले बंगाल के 40 शहरो से 6132 टन कूडा गंगा में गिरता है । पर बंगाल का जिक्र आते ही प्रधानमत्री का नजरिया उसी दायरे को क्यो टटोलता है जिस दायरे की रचना उन्होने पूरे देश की है  ये सवाल ना तो कोई पूछ सकता है ना ही को बता सकता है कि लकीर कौन सी खिंचे ।

असल में दुनिया जब ये जानती और सुनती है कि भारत में बरस भर के भीतर एक करोड 9 लाख रोजगार कम हो गये  या फिर बीते 14 बरस में पहली बार आर्थिक पायदान पर निवेश सबसे कम हो रहा है  लेकिन मन तो खुद की सफलता बताने के लिये बेताब है और सामने बैठकर 95 मिनट गुजारने की चाह हो तो ऐसे सवाल निकलेगें नहीं और जवाब ऐसे आयेगें ही नहीं जिससे लगे कि देश के प्रधानमंत्री को कोई चिंता है या पूछने वाले को भी देश को कोई चिंता है  । तो क्या जाम टकराने वाले माहौल में लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है  या फिर पूंजीवाद की नई परिभाषा में लोकतंत्र के नाम पर सत्ता की तरफ से मुनाफे की रकम ही इतनी ज्यादा है कि एक सत्ता सवाल करती है दूसरी सत्ता जवाब देती है । यानी जनता गायब है  । तो जनता से सरोकार ना रखने की एवज में दुनिया की सबसे बडी पार्टी सबसे रईस होकर , सबसे बडे इन्फ्रस्ट्रक्चर को पाल कर भी अगर चुनाव हार जाती है तो फिर लोकतंत्र का चौता स्तम्भ भी कैसे जितेगा । सरोकार तो उसके भी नहीं बच रहे है । तो फिर इन हालातो पर इन्ही सत्ता धारियो के नजरिये पर कामेंट राहुल गांधी करें और उसपर टिप्पणी एडिटर गिल्ड के अध्यक्ष करें तो उनका दिवालियापन भी समझा जा सकता है  । यानी इस कटघरे में लगता यही है कि जिसे मौका मिलेगा वह अपने दायरे में अब मोदी ही हो जायेगा  वह लोकतंत्र का पहला स्तम्भ हो या चौथा स्तम्भ । क्योकि गरीब गुरबो से लेकर किसान मजदूर पर रुपया लुटाने के लिये बैचेन प्रधानमंत्री रिजर्व बैक में जमा तीन लाख करोड निकालने के लिये बेताब है  लेकिन इससे ज्यादा रकम जो अलग अलग योजनाओ या नीतियो के आसरे बांटी गई वह यू ही कैसे पडी रह गई इस पर भी प्रधानमंत्री ना देखना चाहते है । ना कोई जवाब देना चाहते है । ना ही कोई सवाल करने को तैयार है । मसलन किसान विकास पत्र करीब ढाई हजार करोड रुपया लेने वाला कोई नहीं है । महीने की इनकम स्कीम का दो हजार करोड से ज्यादा की रकम यू ही पडी हुई है । नेशनल सेविग सर्टिफिक्ट के तहत 1888 करोड की रकम पडी हुई है  पीपएफ, रेकरिंग डिपोजिट , टाइम डिपोडिट का करीब तीन हजा करोड की रकम यू ही पडी हुई है कोई दावेदार नहीं है । यानी देश में हालात ऐसे है कि राजनीति सत्ता कही से भी कुछ भी रकम उटाकर त्तकाल सियासी राहत के लिये बांटने को बैचेन है । पर वह कितना सकारात्मक है । कितना असरकारक है कोई देखने-समझने वाला नहीं है । क्योकि राजनीतिक सत्ता का पेट ही कुछ उस तरह भरा हुआ है जहा वह सिर्फ सत्ता भोगने के लिये ही सत्ता को चला रही है  ।

तो 95 मिनट के इंटरव्यू में प्रधानमंत्री क्या बोले और सामने वाले ने क्या पूछा । और जो पूछा या कहा गया उसपर वक्त जायर करने का मतलब क्या है ये इससे भी समझा जा सकता है कि देश इस हद तक मोदीमय हो चुका है कि उसे फिक्र ही नहीं है दुनिया के बौध्दिक जगत से भारत गायब हो चला है।   हालात इतने बूरे है कि दुनिया के टाप चार हजार स्कालर साइटिस्टो में भारत के सिर्फ 10 साइटिस्ट का नाम ही आया है । और यहा साइटिस्ट का मतलब सिर्फ विज्ञान नहीं है बल्कि सोशल साइस्टिस्ट भी है । जो सामाजिक क्षेत्र में काम कर रहे है । और ऐसा भी नहीं है कि भारत में ये क्षमता नहीं है कि वह दुनिया को राह दिखा सके । पन्द्रह बरस पहले भारत और चीन के साइनटिस्ट की तादा दुनिया के बौद्दिक क्षेत्र में बराबर हुआ करती थी  पर 2018 में चीन के 482 साइटिस्ट है तो भारत के महज दस  । और शायद उसके सबसे बडी वजह भी यही है कि 95 मिनट तक संवाद में ना प्रधानमंत्री को पता है कि देश को क्या बताना है और ना ही पूछने वालो को पता है कि सामने बैठने से कुछ नहीं होगा .... सुनने वालो के लिये प्रधानमंत्री से पूछना होगा कि जिन्हे चुनाव नहीं लडना है  । जो राजनीति में आना ही नहीं चाहते है । जो नोटा पर भरोसा करने लगे है । जो अलग अलग क्षेत्रो में काम करते हुये देस का नाम रोशन करना चाहते है । जो अच्छी उच्च शिक्षा चाहते है . जो बेहतर पब्लिक हेल्थ सर्विस, पब्लिक ट्रसंपोर्ट की सोचते है। जो देश में साफ हवा पानी के लिये संघंर्ष  कर रहे है । उन आवाजो को या उनकी जररुरतो को आपने खत्म क्यो कर दिया । क्या 57 महीने की सत्ता भोगने के बाद वाकई कोई अपराधबोध नहीं है । या फिर 60 बरस की सत्ता का जिक्र कर अपने 60 महीने की सत्ता को सही ठहराया जा सकता है । यानी ना खत्म होने वाला सत्ता का सियासी युद्द ही स्वर्णिम भारत का स्वर्णिम इतिहास है ।

राहुल गांधी ने काग्रेस पर लगे हाईकमान के ढक्कन को खोल दिया..


अगर काग्रेस पर लगे हाईकमान के ढक्कन को खोल दिया जाये तो क्या होगा । ये सवाल करीब दस बरस पहले राहुल गांधी ने ही सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक से पूछा था । और तब उस विश्वलेषक महोदय ने अपने मित्रो से बातचीत में इसका जिक्र करते हुये कहा कि राहुल गांधी राजनीति में रेवोल्शूशनरी परिवर्तन लाना चाहते है । लेकिन अगर अब काग्रेस के मुख्यमंत्री के चयन को लेकर राहुल गांधी के तरीके को समझे तो लगता यही है कि वाकई बोतल में बंद काग्रेस पर लगे हाईकमान के ढक्कन को उन्होने खोल दिया है । 

और चूंकि ये पहली बार हो रहा है तो ना पारंपरिक काग्रेस इसे पचा पा रही है ना ही मीडिया के ये गले उतर रहा है । और बार बार जिस तरह मोदी शाह की युगलबंदी ने इंदिरा के दौर की काग्रेस के तौर तरीको ज्यादा कठोर तरीको से अपना लिया है उसमें दूसरे राजनीतिक दल भी इस हकीकत को समझ नहीं पा रहे है कि राहुल की काग्रेस बदलाव की राह पर है । और ये रास्ता काग्रेस की जरुरत इसलिये हो चला है क्योकि काग्रेस मौजूदा वक्त में सबसे कमजोर है । पारंपरिक वोट बैक खिसक चुके है । पुरानो बुजुर्ग व अनुभवी काग्रेसियो के सामानातंर युवा काग्रेस की एक नई पीढी तैयार हो चुकी है । और संगठन से लेकर राज्य और केन्द्र तक के हालातो को उस धागे में पिरोना है जहा काग्रेस का मंच सबके लिये खुल जाये । यानी सिर्फ किसानो के बीच काम करने वालो में से कोई नेता निकलता है तो उसके लिये भी काग्रेस में जगह हो और दलित या आदिवासियो के बीच से कोई निकलता है तो उसके लिये भी अहम जगह हो । और तो और बीजेपी में भी जब किसी जनाधार वाले नेता को ये लगेगा कि अमित शाह की तानाशाही तो उसके जनाधार को ही खत्म कर उसे बौना कर देगी तो उसके लिये भी काग्रेस में आना आसान हो जायेगा । 

महत्वपूर्ण ये है कि इन सारी संभावनाओ को अपनाना काग्रेस की मजबूरी भी है और जरुरत भी है । क्योकि राहुल गांधी इस हकीकत को भी समझ रहे है कि काग्रेस को खत्म करने के लिये मोदी-शाह उसी काग्रेसी रास्ते पर चले जहा निर्णय हाईकमान के हाथ में होता है और हाईकमान की बिसात उनके अपने कारिन्दे नेताओ के जरीये बिछायी गई होती है ।  तो राहुल ने हाईकमान के ढक्कन को काग्रेस पर ये कहकर उठा दिया कि सीएम वही होगा जिसे कार्यकत्ता और विधायक पंसद करेगे । और ध्यान दें तो "शक्ति एप " के जरीये जब राहुल गांधी ने विधायक-कायकत्ताओ के पास ये संदेश भेजा कि वह किसे मुख्यमंत्री के तौर पर पंसद करते है तो शुरुआत में मीडिया ने इसपर ठहाके ही लगाये । राजनीतिक विश्लेषक हो या दूसरे दल हर किसी के लिये ये एक मजाक हो गया कि लाखो कार्यकत्ताओ के जवाब के बाद कोई कैसे मुख्यमंत्री का चयन करेगा । दरअसल डाटा का खेल यही है । 

डाटा हमेशा ब्लैक-एंड वाइट में होता है । यानी उसपर शक करने की गुंजाइश सिर्फ इतनी भर होती है कि जवाब भेजने वाले को किसी ने प्रभावित कर दिया हो । लेकिन एक बार डाटा आ गया तो मुख्यमंत्री पद के अनेको दावेदार के सामने उस डाटा को रखकर पूछा तो जा ही सकता है कि उसकी लोकप्रियता का पैमाना डाटा के अनुकुल या प्रतिकुल है । मध्यप्रदेश में कमलनाथ को भी मुख्यमंत्री पद के लिये चुने जाने की जरुरत होनी नहीं चाहिये थी । क्योकि ये हर कोई जानता है कि कमलनाथ ने चुनाव में पैसा भी लगाया और उनके पीछे दिग्विजिय सिंह भी खडे थे । यानी सिधिया के सीएम बनने का सवाल ही नहीं था । लेकिन " शक्ति एप" के जरीये जमा किया जाटा जब सिंधिया को दिखाया गया तो सिंधिया के पास भी दावे के लिये कोई तर्क था नहीं । दरअसल यही स्थिति राजस्थान की है । पहली नजर में लग सकता है कि बीचे चार बरस से जिस तरह सचिन पायलय ने राजस्थान में काग्रेस को खडा करने के लिये जान डाल रहे थे उस वक्त असोक गहलोत केन्द्र की राजनीति में सक्रिय थे । याद किजिये गुजरात-कर्नाटक में गहलोत की सक्रियता । लेकिन यहा फिर सवाल डाटा का है । और पायलट के सामने गहलोत आ खडे हो गया तो उसकी सबसे बडी वजह गहलोत की अपनी लोकप्रियता जो उन्होने मुख्यमंत्री रहते ही बनायी [ माना जाता है कि गहलोत के वक्त बीजेपी नेताओ के भी काम हो जाते थे और वसुंधरा के दौर में बीजेपी नेताओ को भी दुष्यतं के दरबार में चढावा देना पडता था ] उसे सचिन का राजनीतिक श्रम भी तोड नहीं पाया । कमोवेश छत्तसगढ में भी यही हुआ । 

हालाकि छत्तिसगढ की राजनीति को समझने वाले कट्टर युवा काग्रेसी भी मानते है कि टीएस सिंहदेव या ताम्रध्वज साहू के सीएम होने का मतलब बीजेपी की बी टीम सत्ता में है । और भूपेश बधेल ही एक मात्र नेता है जो रमन सिंह की सत्ता या राज्य में अडानी के खनन  लूट पर पहले बोलते थे सीएम बनने के बाद कार्रवाई कर सकते है । लेकिन फिर सवाल काग्रे के उस ढक्कन को खोलने का है जिसमें कार्यकत्ता को ये ना लगे कि हाईकमान के निर्देश पर पैराशूट सीएम बैठा दिया गया है । जाहिर है इसके खतरे भी है और भविष्य की राजनीति में सत्ता तक ना पहुंच पाने का संकट भी है । जाहिर है पारपरिक काग्रेसियो के लिये ये झटका है लेकिन राहुल गांधी की राजनीति को समझने वाले पहली बार ये भी समझ रहे है कि काग्रेस को आने वाले पचास वर्षो तक अपने पैरो पर खडा होना है या क्षत्रप या दूसरे राजनीतिक दलो के आसरे चलना है । फिर राहुल गांधी के पास गंवाने के लिये भी कुछ नहीं है [ कमजोर व थकी हुई काग्रेस के वक्त राहुल गांधी अध्य़क्ष बने ] लेकिन पाने के लिये काग्रेस के स्वर्णिम अतीत को काग्रेस के भविष्य में तब्दिल करना है । और इसके लिये सिर्फ काग्रेसी शब्द से काम नहीं चलेगा । बल्कि बहुमुखी भारत के अलग अलग मुद्दो को काग्रेस की छतरी तले कैसे समेट कर समाधान की दिशा दिखायी जा सकती है अब सवाल उसका है । इसलिये ध्यान दे तो तीन राज्यो में जीती के बाद किसानो की कर्जमाफी को किसानो की खुशहाली के रास्ते को बेहद छोटा सा कदम बताते हुये किसान के संकट के बडे कैनवास को समझने की जरुरत बतायी । यानी इक्नामिक माडल भी कैसे बदलेगा और हर तबके के लिये बराबरी वाली नीतिया कैसे लागू हो ये सवाल तो है । 

यानी तीन राज्यो की जीत के बाद तीनो राज्य के  मुख्यमंत्री अगर सिर्फ उसे चुन लिया जाये जो 2019 के लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा वोट दिलाने का दावा करे. , तो अगला सवाल ये भी होगा कि दावा तो कई नेता कर सकते है । लेकिन राहुल की काग्रेस उस राजनीतिक डर से मुक्ति चाहती है जहा सत्ता ना मिलने पर कोई नेता पार्टी तोड बीजेपी या अन्य किसी छत्रप से जा मिले और सीएम बन जाये । राहुल गांधी धीरे धीरे उस काग्रेस को मथ रहे है जो एक ऐसा खुला मंच हो जहा कोई भी आकर काम करें और लोकप्रियता के अंदाज में कोई भी पद ले लें । हां, इन तमाम विश्लेषण का आखरी सच यही है कि किसी कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट पार्टी की तर्ज पर राहुल गांधी काग्रेस के महासचिव [ अध्यक्ष ] है । जिन्हे हटाया नहीं जा सकता । और काग्रे का सच भी है कि गांधी-नेहरु परिवार के ही ईर्द-गिर्द काग्रेस है । लेकिन राहुल गांधी ने काग्रेस पर लगे हाईकमान के ढकक्न को खोल दिया है ।

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शनिवार, 5 जनवरी 2019

जनवरी में बीजेपी का संविधान संशोधन होगा या अमित शाह अध्यक्ष पद की कुर्सी छोड देगें....


गुजरात में काग्रेस नाक के करीब पहुंच गई । कर्नाटक में बीजेपी जीत नहीं पाई । काग्रेस को देवेगौडा का साथ मिल गया । मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ में पन्द्रह बरस की सत्ता बीजेपी ने गंवा दी । राजस्थान में बीजेपी हार गई । तेलगाना में हिन्दुत्व की छतरी तले भी बीजेपी की कोई पहचान नहीं और नार्थ इस्ट में संघ की शाखाओ के विस्तार के बावजूद मिजोरम में बीजेपी की कोई राजनीतिक जमीन नहीं । तो फिर पन्ने पन्ने थमा कर पन्ना प्रमुख बनाना । या बूथ बूथ बांट कर रणनीति की सोचना । या मोटरसाईकिल थमा कर कार्यकत्ता में रफ्तार ला देना । या फिर संगठन के लिये अथाह पूंजी खर्च कर हर रैली को सफल बना देना । और बेरोजगारी के दौर में नारो के शोर को ही रोजगार में बदलने का खेल कर देना । फिर भी जीत ना मिले तो क्या बीजेपी के चाणक्य फेल हो गये है या जिस रणनीति को साध कर लोकतंत्र को ही अपनी हथेलियो पर नचाने का सपना अपनो में बांटा अब उसके दिन पूरे हो गये है । क्योकि अर्से बाद संघ के भीतर ही नहीं बीजेपी के अंदरखाने भी ये सवाल तेजी से पनप रहा है कि अमित शाह की अध्यक्ष के तौर पर नौकरी अब पूरी हो चली है और जनवरी में अमित साह को स्वत ही अद्यक्ष की कुर्सी खाली कर देनी चाहिये । यानी बीजेपी के संविधान में संशोधन कर अब जितने दिन अमित शाह अध्यक्ष बने रहे तो फिर बीजेपी में अनुशासन । संघ के राजनीतिक शुद्दिकरण की ही धज्जियां उडती चली जायेगी । यानी जो सवाल 2015 में बिहार के चुनाव में हार के बाद उठा था और तब अमित शाह ने तो हार पर ना बोलने की कसम खाकर खामोशी बरत ली थी । पर तब राजनाथ सिंह ने मोदी-शाह की उडान को देखते हुये कहा था कि अगले छह बरस तक शाह बीजेपी अध्यक्ष बने रहेगें । लेकिन संयोग से 2014 में 22 सीटे जीतने वाली बीजेपी के पर उसकी अपनी रणनीति के तहत अमित साह ने ही कतर कर 17 सीटो पर समझौता कर लिया । तो उससे संकेत साफ उभरे कि अमित शाह के ही वक्त रणनीति ही नहीं बिसात भी कमजोर हो चली है । जो रामविलास पासवान से कही ज्यादा बडा दांव खेल कर अमित शाह किसी तरह गंठबंधन के साथियो को साथ खडा रखना चाहते है । क्योकि हार की ठिकरा समूह के बीच फूटेगा तो दोष किसे दिया जाये इसपर तर्क गढे जा सकते है लेकिन अपने बूते चुनाव लडना । अपने बूते चुनाव ल़डकर जीतने का दावा करना । और हार होने पर खामोशी बरत कर अगली रणनीति में जुट जाना । ये सब 2014 की सबसे बडी मोदी जीत के साथ 2018 तक तो चलता रहा । लेकिन 2019 में बेडा पार कैसे लगेगा । इसपर अब संघ में चिंतन मनन तो बीजेपी के भीतरी कंकडो की आवाज सुनाई देने लगी है । और साथी सहयोगी तो खुल कर बीजेपी के ही एंजेडे की बोली लगाने लगे है । शिवसेना को लगने लगा है कि जब बीजेपी की धार ही कुंद हो चली है तो फिर बीजेपी हिन्दुत्व का बोझ भी नहीं उठा पायेगी और राम मंदिर तो कंघो को ही झुका देगा । तो शिवसेना खुद को अयोध्या का द्वारपाल बताने से चुक नहीं रही है । और खुद को ही राममंदिर का सबेस बडा हिमायती बताते वक्त ये ध्यान दे रही है कि बीजेपी का बंटाधार हिन्दुत्व तले ही हो जाये । जिससे एक वक्त शिवसेना को वसूली पार्टी कहने वाले गुजरातियो को वह दो तरफा मार दे सके । यानी एक तरफ मुबंई में रहने वाले गुजरातियो को बता सके कि अब मोदी-शाह की जोडी चलेगी नहीं तो शिवसेना की छांव तले सभी को आना होगा और दूसरा धारा-370 से लेकर अयोध्या तक के मुद्दे को जब शिवसेना ज्यादा तेवर के साथ उठा सकने में सक्षम है तो फिर सरसंघचालक मोहन भागवत सिर्फ प्रणव मुखर्जी पर प्रेम दिखाकर अपना विस्तार क्यो कर रहे है । उनसे तो बेहतर है कि शिवसेना के साथ संघ भी खडा हो जाये यानी अमित शाह का बोरिया बिस्तर बांध कर उनकी जगह नीतिन गडकरी को ले आये । जिनकी ना सिर्फ शिवसेना से बल्कि राजठाकरे से भी पटती है और भगोडे कारपोरेट को भी समेटने में गडकरी कही ज्यादा माहिर है । और गडकरी की चाल से फडनवीस को भी पटरी पर लाया जा सकता है जो अभी भी मोदी-शाह की शह पर गडकरी को टिकने नहीं देते और लडाई मुबंई से नागपुर तक खुले तौर पर नजर आती है ।
यू ये सवाल संघ के भीतर ही नहीं बीजेपी के अंदरखाने भी कुलाचे मारने लगा है कि मोदी-शाह की जोडी चेहरे और आईने वाली है । यानी कभी सामाजिक-आर्थिक या राडनीतिक तौर पर भी बैलेस करने की जरुरत आ पडी तो हालात संभलेगें नहीं । लेकिन अब अगर अमित साह की जगह गडकरी को अध्यक्ष की कुर्सी सौप दी जाती है तो उससे एनडीए के पुराने साथियो में भी अच्छा मैसेज जायेगा । क्योकि जिस तरह काग्रेस तीन राज्यो में जीत के बाद समूचे विपक्ष को समेट रही है और विपक्ष जो क्षत्रपो का समूह है वह भी हर हाल में मोदी-शाह की हराने के लिये काग्रेस से अपने अंतर्विरोधो का भी दरकिनार कर काग्रेस के पीछ खडा हो रहा है । उसे अगर साधा जा सकता है तो शाह की जगह गडकरी को लाने का वक्त यही है । क्योकि ममता बनर्जी हो या चन्द्रबाबू नायडू , डीएमके हो या टीआर एस या बीजू जनता दल । सभी वाजपेयी-आडवाानी -जोशी के दौर में बीजेपी के साथ इस लिये गये क्योकि बीजेपी ने इन्हे साथ लिया और इन्होने साथ इसलिये दिया क्योकि सभी को काग्रे से अपनी राजनीतिक जमीन के छिनने का खतरा था । लेकिन मोदी-शाह की राजनाीतिक सोच ने तो क्षत्रपो को ही खत्म करने की ठान ली । और पैसा, जांच एंजेसी , कानूनी कार्वराई के जरीये क्षत्रपो का हुक्का-पानी तक बंद कर दिया । पासवान भी अपने अंतर्विरोधो की गठरी उटाये बीजेपी के साथ खडे है । सत्ता से हटते ही कानूनी कार्वाई के खतरे उन्हे भी है । और सत्ता छोडने के बाद सत्ता में भागेदारी का हिस्सा सूई की नोंक से भी कम हो सकता है । लेकिन यहा सवाल सत्ता के लिये बिक कर राजनीति करने वाले क्षत्रपो की कतार भी कितनी पाररदर्शी हो चुकी है और वोटर भी कैसे इस हकीकत को समझ चुका है ये मायावती के सिमटते आधार तले मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तिसगढ में बाखूबी उभ गया । लेकिन आखरी सवाल यही है कि क्या नये बरस में बीजेपी और संघ अपनी ही बिसात जो मोदी-शाह पर टिकी है उसे बदल कर नई बिसात बिछाने की ताकत रखती है या नहीं । उहापोह इस बात को लेकर है कि शाह हटते तो नैतिक तौर पर बीजेपी कार्यकत्ता इसे बीजेपी की हार मान लेगा या रणनीति बदलने को जश्न के तौर पर लेगा ।  क्योकि इसे तो हर कोई जान रहा है कि 2019 में जीत के लिये बिसात बदलने की जरुरत आ चुकी है । अन्यथा मोदी की हार बीजेपी को बीस बरस पीछे ले जायेगी । 

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

साहेब की लीला देखने-दिखाने के लिये तैयार हो रहा है रामलीला मैदान


ये पहली बार होगा कि पीएमओ अपने कटघरे से बाहर निकलेगा और दो दिन दिल्ली के रामलीला मैदान से पीएमओ काम करेगा । लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं होगा कि पीएमओ जनता के बीच जा रहा है । या जनता से जुड रहा है । दरअसल पीएमओ  अपने ही मंत्रियो । अपने ही सांसदो । अपने ही मुख्यमंत्रियो । अपने ही पार्टी संगठन संभाले नेताओ । अपने ही मेयर । अपने ही अलग अलग विंग के प्रमुखो से रुबरु होगा । यानी साठ महीने की सत्ता के 57 वें महीने बीजेपी खुद का राष्ट्रीय कन्वेशन इस तरह दिल्ली में करेगी जिससे लगे कि सत्ता-सरकार-साहेब-सेवक सभी उस रामलीला मैदान में जुटे है जहाल से अक्सर सत्ता को ही चेताने का काम लोहिया -जेपी के दौर से लेकर अन्ना तक ने किया । लेकिन जब 11-12 जनवरी को  सत्ता ही रामलीला मैदान में जुटेगी तब ये बहस खास होनी चाहिये कि देश का मतलब क्या सिर्फ चुनाव हो चुका है । देश में सबके विकास का अर्थ चुनावी नारा हो चुका है । देश की संस्कृति का अर्थ राम मंदिर में जा सिमटा है । देश की स्वर्णिम सम्यता का मतलब राष्ट्रवाद जगाने में जा सिमटा है । क्योकि रामलीला मैदान में जिन तीन प्रस्ताव पर चर्चा कर पास किया जायेगा वह राजनीतिक हालात , आर्थिक नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर  होगें । और चाहे अनचाहे रामलीला मैदान के इन तीन प्रस्ताव के छांव तले निगाहो में तीन महीने बाद होने वाले आम चुनाव ही होगें ।

लेकिन जिस तरह की तैयारी रामलीला मैदान में पीएमओ स्थापित करने की हो रही है वह अपने आप में देश के सामने सवाल ही पैदा करता है कि देश कभी स्वर्णिम था या कभी स्वर्मिण हो पायेगा ये सब सत्ता की मदहोशी तले ही दफ्न है । क्योकि जिस रामलीला मैदान तक कार से पहुंचना आज भी दुरुह कार्य है । जिस रामलीला मैदान में एक साफ शौचालय तक नहीं है । जिस रामलीला मैदान में पीने का पानी उपलब्ध नही है । जिस रामलीला मैदान में छह गज साफ जमीन नहीं है जहा आप बैठ सके । उस रामलीला मैदान को पीएमओ के लिये जब इस तरह तैयार किया जा सकता है कि हवाई अड्डे या रेलवे स्टेशन से कोई भी बिना तकलीफ पहुंच जाये । दो हजार लोगो के लिये पांच सितारा भोजन बनने लगे । इलाज के लिये अस्पताल खुल जाये । तीन दर्जन डाक्टरो की टीम चौबिसो घंटे तत्पर मिले । कतार में दर्जनो एंबुलेंस खडी दिखायी दे । दीवारो को मात देते जर्मनी के बने टैंटो में सोने की शानदार व्यवस्था कुछ ऐसी हो कि कि पूरे रामलीला मैदान में कभी भी मिट्टी की जमीन दिखायी ही ना दें । यानी नीचे मखमली कारपेट । उपर जर्मन टेंट । सिल्क के पर्दे । खादी सिल्क की चादर । पांच सितारा को मात करने वाला मसलंद । और जयपुरिया रजाई का सुकुन । साफ हवा के लिये हर कमरे में एयर प्यूरीफायर । गर्मी के लिये रुम हीटर । पीएम के लिये खासतौर पर घर की टेंटदिवारी के भीतर ही आंगन की व्यवस्था भी । और पीने के साफ पानी या शौचालयो की कतार के बारे तो पूछना ही बेकार है क्योकि ये राष्ट्रीय पर्व का हिस्सा 2014 से ही बन चुका है जब गंगा को स्वच्छा व निर्मल बनाने का प्रण किया गया और स्वच्छता मिशन के लिये महात्मा गांधी के चश्मे को अपना लिया गया ।

तो सोने की चिडिया भारत में कोई कमी है नहीं । बस सवाल सिर्फ इतना सा है जनता जहा रहेगी वहा मुफळीसी होगी । रोजी रोटी के लाले पडेगें । न्यूनतम जरुरतो के लिये जद्दोजहद करना पडेगा । पानी व शौचालय तक के लिये सेवको की सत्ता के राजाओ से गुहार लगानी पडेगी । लेकिन उसी जगह पर अगर सत्ता चली जाये तो स्वर्ग का आभास जनता के ही पैसो पर ही हो सकता है । यानी जो नजारा रामलीला मैदान में 11-12 जनवरी को नजर आने वाला है वह सत्ता के नीरो होने के खुले संकेत देगा । क्योकि रामलीला मैदान में जमा होने वाले 280 सांसदो में से 227 सांसद ऐसे है जो जिस क्षेत्र से चुन कर आये है वहा के 35 फिसदी वोटर गरीबी की रेखा से नीचे है । उनमें से 110 सांसद तो ऐसे क्षेत्र से चुन कर रामलीला मैदान में आये है जिनके जिलो को नेहरु के दौर में बिमार माना गया और ये बिमारी मोदी के दौर में भी बरकरार है । बकायदा नीति आयोग ने जिन 125 जिलो को आशप्रेशनल जिले यानी सबसे पिछडे जिले के तौर पर चिन्नहित किया है वहा से बीजेपी के 98 सांसद 2014 में चुने गये । और अब वह सभी देश की राजनीति और इक्नामी पर पास होने वाले रामलीला मैदान के प्रस्ताव पर ताली बजाने के तैयार है । और ताली बजवाने के लिये देश के सबसे बडे सेवक के लिये रामलीला मैदान में खास व्यवस्था की जा रही है । इससे पहले नेहरु से लेकर इंदिरा गांधी और वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह को कभी नहीं सुझा कि तीन मूर्ति या एक सफदर जंग रोड या फिर 7 आरसीआर से बाहर निकल कर रामलीला मैदान में पीएमओ लगाया जाये । ये तो मौजूदा दौर में गरीब-मुफलिसो का नाम लेने वाले सेवक की चाहत है जो नाम बदल में इतनी रुची रखते है कि 7 आरसीआर का नाम लोककल्याण मार्ग कर गरीबो के लिये कुछ करने का सुकुन पा लिया गया । अब वह दौर तो है नहीं कि तीनमूर्त्ती में रहते नेहरु की रईसी को रामलीला मैदान में खडे होकर राममनोहर लोहिया चुनौती दे दें । या फिर इंदिरा गांधी की तानाशाही सत्ता को रामलीला मैदान से खडे होकर जेपी चुनोती देते हुये एलान कर दें कि कुर्सी खाली करो की जनता आती है । अब तो जेपी का नाम लेले कर इंदिरा से ज्यादा बडे तानाशाह बनने की होड है । और खुद को लोहियावादी कहकर पांच सितारा  जिन्दगी जीने दौर है । पीओमओ का नाम लोककल्याण कर सुकुन पाने का दौर है । कोई सवाल करें तो कभी आंबेडकर तो कभी सुभाष चन्द्र बोस तो कभी सरदार पटेल और कभी महात्मा गांधी का अनुयायी खुद को बताकर देशभक्ति या राष्ट्रवाद की ऐसी चादर ओढने का वक्त है जहा देखने वाला रामलीला मैदान में सत्ता के जमावडे को भी सीमा पर संघर्ष करते जवानो की तर्ज पर देखे । और भारत माता की जय के उदघोष तले देश के स्वर्णिम दौर को महसूस करें । क्योकि रायसीना हिल्स की जमीन को तो अग्रेजी हुकुमत ने 1894 में कब्जे में कर वायसराय की कोठी बनायी । फिर वहा आजादी के बाद वहा राष्ट्रपति भवन से लेकर नार्थ-साउथ ब्लाक बना । और साउथ ब्लाक में ही प्रधान सेवक का कार्यालय काम करता है । जो आजाद हिन्दुस्तान में आज भी गुलामी का प्रतिक है । तभी गांधी जी ने भी 1947 की 15 अगस्त को सिर्फ सत्ता हस्तातरंण माना । और खुद कभी भी रायसीना हिल्स के समारोह में शामिल नहीं हुये । लेकिन रामलीला मैदान तो 1930 तक एक तालाब हुआ करता था । आजादी के संर्घष के दौर में हीतालाब मैदान में बदला । जहा महात्मा गांधी से लेकर नेहरु और पटेल तक ने सभा की । और तभी से रामलीला मैदान सत्ता के खिलाफ संघर्ष का पैमाना बन गया । लेकिन पहली बार सत्ता ही जब रामलीला मैदान में होगी तो सवाल संघर्ष का नहीं पांच सितारा जिन्दगी भोगती सत्ता का सत्ता पाने के लिये संघर्ष की परिभाषा भी बदलने की होगी । ।